Thursday, 30 July 2015

जीएसटी

अभी हाल ही मे भारतीय सरकार ने तय किया है कि वस्तु ‍एवं सेवा कर (जीएसटी) को भारतीय व्यवस्था मे शामिल किया जाऐगा। यह भारतीय सरकार द्वारा अमीर लोगों के पक्ष मे एक और कदम है। भारतीय सरकार का कहना है कि वह जीएसटी का समर्थन इसलिए कर रही है क्युंकि ऐसा करने से पैसा, मजदूर और व्यापार की वस्तुओं का मुक्त रुप से संचार होगा और वह भी विभिन्न राज्यों द्वारा लगाई गई बाधाओं के बिना।

भारतीय सरकार के इस कदम का मूल्यांकन करने से पहले जरूरी है कि हम जीएसटी का मतलब जानें। इसलिए मैं यहाँ वस्तु एवं सेवा कर का संिक्षप्त मे वर्णन करता हूं।

जीएसटी के अधीन, केंद्रीय सरकार सभी वस्तुओं पर सिर्फ़ एक ही कर लगाऐगी और राज्यों के पास कर इकट्ठा करने का कोई अधिकार नहीं रहेगा। केंद्रीय सरकार का कहना है कि इस जिएसटी कर को इकट्ठा करके वह हर राज्य को उसकी जरूरत के अनुसार राजस्व देगी।

अब समय है कि भारतीय सरकार के इस निर्णय का विस्तार से मूल्यांकन किया जाए और इस मुद्दे पर चर्चा की जाऐ कि कैसे यह जीएसटी हमारी व्यवस्था को नष्ट कर देगा।

सबसे पहले यह जीएसटी हमारे देश के सभी राज्यों की प्रधानता को नष्ट कर देगा। जब मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कई बार कहा था कि हमारी व्यवस्था मे विकेन्द्रीकरण की बहुत जरूरत है जिससे कि हर राज्य के अपने अधिकार हों। लेकिन भारत का प्रधानमंत्री बनते ही उनकी सोच मे अचानक इतना बदलाव कैसे आ गया??????

यह जीएसटी केंद्रीय सरकार के एकाधिकार को बढ़ावा देगा और यह एक कदम है सरकार के द्वारा हमारे देश को आर्थिक तानाशाही की तरफ ले जाने का। यह कदम राज्य सरकार से उसके राजस्व को इकट्ठा करने का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत को उससे छीन लेगा और उसके बाद, राज्य सरकार पूरी तरह से केंद्रीय सरकार पर निर्भर हो जायेगी अपने विकास परियोजनाओं को लेकर। यह भी हो सकता है कि केंद्रीय सरकार राजस्व के आवंटन मे पक्षपात करे। और यह भी संभव है कि हर केंद्रीय सरकार उन राज्यों को ज्यादा धन दे जिन राज्यों मे उसकी अपनी पार्टी की सरकार है।

एक केंद्रीय सरकार हमेशा चाहेगी कि वह कर को कम से कम रखे क्युंकि जीएसटी के लागु होने के बाद उसके पास हमारे देश की आर्थिक पर्णाली पर पूर्ण रूप से एकाधिकार होगा। वहीं दूसरे तरफ कराधान शक्तियों का राज्य सरकार के पास विकेन्द्रीकृत होने की वजह से कर प्रतिद्वन्दता को हासिल करने में कामयाबी मिलेगी जिसकी जरूरत कर दरों को कम करने के लिए अत्यावश्यक है। हमारे देश के वित्त मंत्री को यह समझना चाहिए कि पिछले दशक में भारत के विभिन्न राज्यों के बीच प्रतिद्वन्दता ही अधिक निवेश और आर्थिक विकास का मुख्य कारण है।

विभिन्न यूरोपीय देशों के बीच कराधान प्रणाली में प्रतिद्वन्दता ही पिछले दशकों में वहाँ के विकास का मुख्य कारण रहा है। पश्चिमी यूरोप के कई देश अपने कर की दर को कम रखते हैं क्युंकि पूर्वी यूरोप के दे‍शों में कर की दर कम है इसलिए निवेश को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए पश्चिमी यूरोप के देश अपनी कर की दर को कम रखते हैं। यही कारण है कि जीएसटी हमारे देश राज्यों के बीच की प्रतिद्वन्दता को खत्म कर देगी।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जीएसटी के तहत सभी वस्तुओं पर एकसमान कर होगा। जीएसटी के अंतर्गत सिगरेट पर भी वही कर होगा जो कि फ्रूट जूस पर है। हमें एक ऐसी कर प्रणाली कि जरूरत है जिसके अंतर्गत हर उस वस्तु पर, जो स्वास्थ्य और समाज के लिए हानिकारक है, उसपर अधिक कर हो। जिससे कि हमे सिगरेट पर ज्यादा औेर फ्रूट जूस पर कम कर देना पढे। ऐसा करने से एक फायदा यह होगा की सिगरेट थोडी महंगी हो जाऐगी और कुछ प्रतिशत लोग शायद सिगरेट पीना छोड दें।

जीएसटी की एक और बुरी बात यह है कि इसके अधीन अमीर लोगों को दस हाजार रुपऐ के एक जूते के लिऐ उतना प्रतिशत ही कर देना होगा जितना किसी हम ओर आप जैसे आम इंसान को किसी दो सौ रुपऐ के जूते के लिऐ देना पढेगा। हमें ऐसे एक प्रणाली की जरुरत है जिसके अधीन हमारे देश के विकास में एक अमीर और गरीब का बराबर का योगदान हो। हम इसे इस तरह समझ सकते हैं कि मान लो एक अमीर आदमी दस हजार के जूतों के लिऐ दो प्रतिशत कर देता है अर्थात् वह अमीर आदमी दो सौ रुपऐ कर के रूप मे अदा कर रहा है और वहीं एक गरीब आदमी दो प्रतिशत कर देता है किसी सौ रुपऐ के जूतों के लिऐ अर्थात् दो रुपऐ। यहाँ दो सौ रुपऐ उस अमीर आदमी के लिऐ नगण्य है जिसकी आमदनी एक करोड़ रुपऐ है जबकि दो रुपऐ उस गरीब आदमी के लिऐ बहुत बडी रकम है जिसकी आमदनी मात्र एक हजार रुपऐ है। यह दो रुपऐ उस गरीब आदमी पर काफी हद तक प्रभाव डालेंगे। इसलिये कर का किसी वस्तु के दाम के अनुसार होना जरूरी है। जूते की खरीद किसी अमीर आदमी के द्वारा और किसी गरीब आदमी के द्वारा एकसमान नहीं है। अतः जीएसटी का यह एक और बुरा उदाहरण है।

कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह का कराधान संभव नहीं है जहाँ अमीरों के लिऐ ज्यादा कर हो और गरीबों के लिऐ कम। ऐसे लोगों को मैं फिनलैंड की कराधान प्रणाली के बारें मे पढने की सलाह दूँगा। फिनलैंड मे हालही मे घटित हुई एक घटना का मैं यहाँ विवरण करना चाहूँगा। 3 मार्च 2015 को एक फिनिश आदमी पर गति के नियम का उल्लंघन करने पर 54,000 यूरो का जुर्माना लगाया गया। गौरतलब है कि फिनलैंड में जुर्माना आय से जुड़ा होता है और जुर्माने का हिसाब उस अपराधी की दैनिक कमाई से होता है। यहाँ अपराधी का नाम Reima Kuislawho था जिसे पुलिस ने 103 km/h की स्पीड पर गाडी चलाते हुऐ पकडा था। तब अधिकारियों ने उसकी 2013 की कर विवरणी की जांच की और पाया कि उसने 2013 मे 6.5 मिलियन यूरोस कमाऐ थे। अतः उन्होंने उस अपराधी को उसकी कमाई के अनुसार जुर्माना लगाया। अगर उसकी 2013 की कमाई कम होती तो अधिकारियों द्वारा उस पर कम जुर्माना लगाया गया होता। इसी तरह की एक और घटना में 2012 में नोकिया में काम करने वाले एक कार्यकारी को तेज गति से बाइक चलाने पर 116,000 यूरो का जुर्माना लगाया था। उस कार्यकारी को इतना ज्यादा जुर्माना उसकी आय की वजह से लगा था जो की 14 मिलियन यूरो थी।

मेरे हिसाब से जुर्माना और कर लगाने के पीछे सबसे बढा उद्देश्य हमें यह अहसास दिलाना होता है कि हमारे देश कि विकास मे हमारे योगदान की भी जरूरत है और साथ ही हमारे अंदर यह चेतना जगाना कि हमे अभी इस देश का बहुत सा कर्ज अदा करना है। इसलिये कर का भुगतान आदमी की आय के अनुसार होना चाहिए। एक अमीर आदमी को ज्यादा कर अदा करना चाहिए और देश के विकास मे बराबर का योगदान देना चाहिए।


हमारी मोदी सरकार से गुजारिश है कि वह इस देश के गरीब लोगों पर भी बराबर ध्यान दे। जेटली जी को भी यह बात ध्यान मे रखना चाहिए कि भारत में आज भी अधिकतर लोग गरीबी रेखा से नीचे ही  जीवन व्यापन कर रहे हैं और उनमें से ज्यादातर लोग गाँवों मे रहते हैं। मोदी जी आपको हम गरीब लोगों की भी देख-रेख करनी है क्युंकि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो हो सकता है कि ये भारत की जनता आपको भी उसी तरह से सत्ता से निकाल कर बाहर फेंक दे जैसे कि 2014 में कांग्रेस के साथ हुआ था।

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