Thursday, 30 July 2015

किसानो का मांगपत्र

१. बिना सहमति, बिना वाजिब मुआवजे के भूमि हड़पने वाला कानून वापिस लिया जाय
हम जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय समुदाय की मिलकियत को मानते है।  हम संसद के सामने विचारार्थ भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक 2015 को पूरी तरह खारिज करते हैं। हम मांग करते हैं कि इस विधेयक और इसी पर आधारित अध्यादेश को वापिस लिया जाय।अंग्रेज़ों के 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह 2013 के कानून ने जो भी सुधार किये थे, वो सब इससे निरस्त हो जायेंगे। जनांदोलनों ने लम्बे संघर्ष के बाद संसद से कुछ हक़ हासिल किये थे: अधिग्रहण से पहले सहमति की अनिवार्यता, अधिग्रहण के असर की जनसुनवाई के माध्यम से जांच, बहु-फसली जमीन को अधिग्रहण से बचाना और पांच साल तक इस्तेमाल न होने पर जमीन वापिस लौटाना।  इस विधेयक से यह सब हक़ फिर से ख़त्म हो जायेंगे।

इसी विधेयक को पिछले दरवाजे से राज्यों से पास करवाने की कोशिश का भी हम पुरजोर विरोध करते हैं। 
हम मांग करते हैं कि भूमि अधिग्रहण निम्न सिद्धांतों पर आधारित हो: 
(क) अधिग्रहण से पहले देश भर में भूमि के इस्तेमाल की नीति बने 
(ख) जहाँ तक संभव हो नयी जमीन का अधिग्रहण न हो, बहु-फसलीय जमीन को बिलकुल न छेड़ा जाय और सरकार के पास पहले से उपलब्ध जमीन को इस्तेमाल किया जाय 
(ग) भू-स्वामियों की सहमति सार्वजनिक या निजी किसी भी प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहण की पूर्व शर्त हो 
(घ) अधिग्रहण के असर की ग्राम सभा में जनसुनवाई अनिवार्य हो 
(ङ) मुआवज़ा "सर्कल रेट" के आधार पर नहीं बल्कि उस कीमत के आधार पर हो जिस पर प्रस्तावित इस्तेमाल के लिए CLU मिलने  के बाद वह जमीन बिक सकेगी 
(च) अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों को प्रस्तावित प्रोजेक्ट के मुनाफे का वाजिब हिस्सा मिले   

२. हर मेहनती किसान परिवार को इज्ज़त का जीवन जीने लायक आय की गारंटी हो: 
किसान देश की खाद्य सार्वभौमता और सुरक्षा का सिपाही है। इसलिए सरकार का कर्त्तव्य है की वो अन्नदाता को इज्ज़त की जिंदगी की गारंटी दे। मेहनत करने वाले किसान को कम से कम इतनी आय जरूर हो जिससे वो अपने खर्चे चला सके, किसी प्रकोप या बीमारी का मुकाबला कर सके और बाकी व्यवसाय या नौकरी वालों जैसा जीवन जी सके।  हम यह मांग करते है कि सरकार एक ऐसा कानून बनाये जो:
(क) यह स्वीकार करे कि किसान को एक न्यूनतम आय सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है 
(ख) इस दायित्व को पूरा करने के लिए एक स्थाई किसान आय आयोग की स्थापना करे
(ग) किसान के लिए एक न्यूनतम आय की गारंटी रेखा परिभाषित करे जो सरकारी सबसे कम तनखा पाने वाले सरकारी कर्मचारी की आय से कम ना हो (आज की मंहगाई में यह गारंटी रेखा 15,000 रुपये मासिक, या 100 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन, से कम नहीं होनी चाहिए) 
(घ)  किसानों को इस गारंटी रेखा से ऊपर रखने की व्यवस्था बनाये।  इस व्यवस्था के कई अंग हो सकते है, मसलन न्यूनतम समर्थन मूल्य,  सभी फसलों की सरकारी खरीद, सस्ता और सुलभ ऋण, सस्ती बीज-खाद-पानी-बिजली, आपदा मुआवज़ा और बाजार में मदद। न्यूनतम समर्थन मूल्य ऐसे निर्धारित किया जाय कि पांच एकड़ असिंचित या ढाई एकड़ सिंचित जोत वाले किसान को इतनी बचत हो सके। न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी 25 फसलों के लिए देश भर में लागू किया जाय। जिन किसानों की आय इस इस गारंटी रेखा से नीचे हो उन्हें सीधे सरकार भरपाई करे।
(ङ) सरकारी कर्मचारियों के सातवें  वेतन आयोग को लागू करने से पहले देश के अन्नदाता के लिए पहला किसान आय आयोग स्थापित किया जाय।   

३. फसल नुकसान का मुआवजा पूरा मिले, सभी को मिले, समय पर मिले और पारदर्शिता से तय हो
 फसलों को नुकसान होने पर आक्समिक और मनमर्जी अनुदान की बजाय तयशुदा रेट से मुआवज़ा दिया जाय ताकि किसान की आय गारंटी रेखा से नीचे न गिरे। 
(क) फसल को किसी भी तरह के नुकसान को इस योजना के अंदर रखा जाय -- इसमें प्राकृतिक आपदा, बाढ़, सुखाड़, जानवरों का हमला, महामारी, बीज या अन्य किसी तकनीकी असफलता को शामिल किया जाय। 
(ख) आपदा घोषित करने की इकाई गाँव से बड़ी न हो। 
(ग) कृषि-राजस्व विभाग द्वारा तय की गयी अनावरी की पुष्टि ग्राम सभा से करने के बाद ही मुआवज़ा तय किया जाय। 
(घ) मुआवज़े की रकम उतनी हो जितना किसान को संभावित उपज के दाम से घाटा हुआ है।  उपज के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य या बाजार भाव में जो भी ज्यादा हो उस आधार पर तय किये जाय। 
(ङ) मुआवजे का भुगतान दो महीने के भीतर हो। 
(च) बटाईदार को मुआवज़े का न्यायसंगत हिस्सा मिले। 

४. भूमिहीन खेतिहर परिवार को कम से कम २ एकड़ जमीन मिले
भूमिहीन को भूमि देना ज़मीन का सबसे अच्छा "सार्वजनिक हित" में इस्तेमाल है -- इससे उत्पादन बढ़ेगा और बेरोजगारी और गरीबी घटेगी। इसलिए बेकार पड़ी खेती योग्य जमीन, अधिग्रहित लेकिन बेकार सरकारी जमीन, भूदान और भूमि सुधार की सरप्लस जमीन और पंचमी, गैरान जैसी दलित-पिछड़े समाज के लिए आरक्षित ज़मीन से भूमिहीन परिवारों को कम से कम २ एकड़ ज़मीन दिया जाय। उन परिवारों को इस जमीन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए सहायता दी जाय। जिन भूमिहीन परिवारों को पट्टा मिल गया था, उन्हें कब्ज़ा दिलाया जाय। हर ग्रामीण परिवार को रिहाइशी जमीन सुनिश्चित करने का कानून बने। 

५. आदिवासी, ठेके पर खेती करने वाले, बटाईदार और महिला किसान के अधिकारों की रक्षा हो 
(क) आदिवासी और परम्परागत रूप से वनाश्रित अन्य समुदायों को वन अधिकार कानून के तहत मिले सभी अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू किया जाय। पांचवी सूची के तहत "पेसा" कानून को लागू कर जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय समुदाय की मिलकियत को स्वीकार किया जाय।
(ख) हर काश्तकार को पहचान पत्र दिया जाय ताकि उसे बैंक लोन, आपदा मुआवज़े और सरकारी सहायता का वाज़िब हिस्सा मिल सके। 
(ग) खेती में महिलाओं के योगदान को औपचारिक स्वीकृति देने और जमीन पर महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाया जाय।  

६. विश्व व्यापार संगठन (WTO) या अन्य किसी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते की शर्ते तय करते वक्त देश की खाद्य सार्वभौमिकता और किसान की आजीविका सबसे पहले देखी जाय। किसानों के हितों के खिलाफ किसी भी समझौते को रद्द किया जाय। 

७. किसान के बीज बचाने, बनाने और  बांटने के परम्परागत अधिकार की रक्षा हो। बीज पर किसी कंपनी का एकाधिकार ना हो। GM बीज को तब तक अनुमति न मिले जब तक वैज्ञानिक और किसान इसके पर्यावरण और सेहत पर असर के बारे में संतुष्ट न हो जाएँ।
 ८. किसान को धीरे-धीरे ऐसी खेती से मुक्त किया जाय जो खर्चीली, पराश्रित और जोखिम भरी साबित हुई है, जिससे मिट्टी और भूगर्भ जल नष्ट हो रहा है और जिससे खाने, पानी और खेत में जहर घुल रहा है। सरकार कम लागत वाली और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ खेती को इतना समर्थन दे ताकि अगले दस साल में  किसान ज़हरीली खेती से मुक्त हो सके। कृषि अनुसन्धान का अनुसन्धान का आधा पैसा इस नयी खेती पर खर्च हो। 
९. बारानी खेती वाले इलाकों में बड़े पैमाने पर सिंचाई की व्यवस्था हो। सिंचाई प्रोजेक्टों में दोषों, देरी और भ्र्ष्टाचार की जांच हो। टैंक और जोहड़ जैसे लघु सिंचाई प्रोजेक्टों और भूगर्भ जल संवर्धन पर बड़े पैमाने पर निवेश हो। बारानी खेती को प्रोत्साहन देने के लिए सूखी फसलों, चारे और मवेशी पालन को प्रोत्साहित किया जाय। 
१०. किसानो को बैंकों से एक लाख तक का लोन ब्याज मुक्त और बिना जमीन को रहन रखे मिले। यह लोन बटाईदार, ठेके के काश्तकार और महिला किसान को भी मिले। कृषि ऋण के बारे में रिजर्व बैंक के अनुदेशों का पालन हो। कृषि के लिए प्राथमिकता के आधार पर मिलने वाला लोन किसान को मिले, उसके नाम पर कंपनियों को नहीं। कृषि उपकरणों के लोन के लिए ज़मीन को रहन रखने पर पाबंदी को सख्ती से लागू किया जाय। कंपनियों की तरह किसानों के बकाया लोन की भी समीक्षा हो, साहूकार के बकाया लोन को बैंक में स्थानांतरित करने की व्यवस्था हो। 
११. सार्वजनिक वितरण व्यवस्था और उसके लिए खाद्यान्नों की सरकारी खरीद को हटाने की बजाय विकेन्द्रित कर और मजबूत किया जाय। इस व्यवस्था को ख़त्म करने की शांता कुमार समिति की सिफारिशों को नामंजूर किया जाय। 
१२. पशुपालक, दुग्ध व्यवसायी, मछली पालक और कुक्कुटपालक भी किसान हैं और इन्हे भी किसान की तरह इज्ज़त की ज़िंदगी जीने लायक न्यूनतम कमाई की गारंटी होनी चाहिए।  इन्हे भी आपदा राहत और बैंक लोन की सभी सुविधा होनी चाहिए। दूध और अण्डे आदि में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्था हो, दुग्ध सहकारिता को बढ़ावा दिया जाय और प्राइवेट कंपनियों के दाम को नियंत्रित किया जाय। गौचर और अन्य पशुओं के चरने की जमीन को अतिक्रमण से बचाया जाय, गर्मी और सूखे के वक्त सस्ता चारा उपलब्ध करवाया जाय।  कुक्कुटपालन को कुटीर उद्योग का दर्ज़ा देकर बड़ी कंपनियों के हमले से बचाया जाय। 
१३. गन्ना किसानों के बकाया भुगतान को अविलम्ब निपटाया जाय, उसके लिए सरकारी सहायता मिल मालिको को नहीं सीधे किसानो को दी जाय। 

No comments:

Post a Comment