Saturday, 24 June 2017

किसान मुक्त भारत- षड्यंत्र

‘‘भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ, आजकल दिल्ली में है जोर-ए-बहस ये मुद्दा!’’ आज मंदसौर से लेकर संसद तक किसान और उसकी खेती ही विषय है। जरा सोचिए, सरकार उसकी आय दोगुना करना चाहती है। बैंक से कर्ज देना चाहती है। संगठन उसके कर्ज माफी की लड़ाई लड़ रहे हैं। किसान के लिए हर तरफ गुस्सा है, हाथ में पत्थर है, वाहनों में आग लगाने को आतुर भीड़ है, शांती बहाली के लिए उपवास व सत्याग्रह है, मगर किसान की किस्मत में उजाड़ खेत और खाली जेब ही है, उसकी किस्मत ऐसी है कि उसका भाग्य नहीं बदल रहा है, आखिर क्यों?

वैश्विक षडयंत्र

दरअसल पिछले 40-50 साल में किसानों के साथ अत्याचार यह हो रहा है कि डिजाइन के तहत उनको कमजोर बनाया जा रहा है। आजादी के बाद की सभी राजनैतिक पार्टियों ने किसानों की बरबादी की ही पाॅलिसी (नीतियां) बनाई है। साल 1996 में वर्ल्ड बैंक ने हमें कहा कि 2015 तक 40 करोड़ लोगों को गांव से निकाल कर शहरों की ओर ले जाना है, हमारी सरकारें इस काम में लग गई। दरअसल सरकार किसानों को धक्का तो नहीं दे सकती लेकिन वो ऐसे आर्थिक हालात पैदा करती है, जिससे आजिज होकर किसान खुद ही खेती छोड़ दे। साल 2008 में वर्ल्ड बैंक ने अपनी रिर्पोट में यह भी कहा कि यह काम भारत को जल्दी करना चाहिए और गांवों के युवाओं के लिए देश भर में प्रशिक्षण केन्द्र खोलने चाहिए जो यह सिखाए कि औद्योगिक मजूदर कैसे बनें, ताकि वे शहरों में जाके मजदूरी कर सकें और यही हुआ साल 2009 में पी. चिदांबरम ने देश भर में एक हजार आई.टी.आई खोले। रघुराम राजन का भी कहना था कि आर्थिक सुधार तभी संभव है जब सस्ते मजदूर हों और सस्ता भोजन हो, और उसके लिए किसानों को गांव से शहरों में ले जाया जाए। चीन ने भी कुछ वर्ष पूर्व अपनी ग्रामीण आबादी को शहरों में बसाने का काम किया था, लेकिन आज वहाँ हालात ये है कि सस्ते मजदूर बेहतर विकल्पों के लिए अफ्रीका चले गए और अब वहाँ खाद्यान संकट पैदा हो गए। हमारे देश में भी राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (एन.एस.एस.ओ) के शोध में ये तथ्य सामने आए थे कि यदि आजिविका का विकल्प मिले तो देश के 42 फीसदी किसान कृषि को छोड़ना चाहते हैं। लेकिन रोजगार सृजन की दिशा में कोई काम नहीं है। वर्ष 2004-05 से 2015-17 के दरमियान मात्र 1.6 करोड़ रोजगार ही मुहैया कराए गए हैं, जबकि देश में हर साल ही 12.5 करोड़ रोजगार की जरूरत है।

हरित क्रांति एक छलावा 

हरित क्रांति के नाम पर जो तकनीकें लाई गई उनसे खेती और खेतीहर, दोनों बर्बाद हुए हैं। खेतों की मिट्टी जवाब दे गई और किसान की खेती करने की इच्छाशक्ति भी। हरित क्रांति के नाम पर आए कृषि रसायन ने भूमि को आज बंजर बना दिया है, जहाँ की धरती सबसे ज्यादा उपजाऊ मानी गई थी,

आज उसी पंजाब में इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव है, आप वहाँ देखेंगे कि मिट्टी की उर्वरता शक्ति समाप्त हो चुकी है। समूची भोजन श्रृंखला विषाक्त है। पंजाब भारत के कुल क्षेत्रफल का 1.5 प्रतिशत क्षेत्र है, परन्तु देश में प्रयुक्त होने वाले कुल जहरीले कीटनाशकों का लगभग 18 प्रतिशत  यहां इस्तेमाल होता है। फिर जिस प्रांत का नाम ही बहुतायत का संकेत था उसमें 80 प्रतिशत भूक्षेत्र के भूजल का अत्यधिक दोहन हो चुका है और इसी डर से हमारे साथी करनैल सिंह पीर मोहम्मद पंजाब की नहर से पानी को हरयाणा नहीं आने देना चाहते और मुद्दे को सड़क से शुरू कर अंतराष्ट्रीय न्यायल तक ले गए हैं। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग के चलते आज स्थिति ये है कि यहाँ मालवा क्षेत्र के एक इलाके को कैंसर पट्टी के नाम से जाना जाने लगा है। इसके अतिरिक्त प्रजनन संबंधी रोगों की बाढ़ ही आ गई है। बड़ी संख्या में किसान खेती छोड़ने को मजबूर हैं।

न्यूनतम सर्मथन मूल्य या उचित मूल्य?

एक अध्ययन में 1970 में गेहूँ का सर्मथन मूल्य 76 रूपया प्रति क्विंटल था 45 वर्ष के बाद उसमें 19 गुणा वृद्धि के साथ 1450 रूपया प्रति क्विंटल हुआ। जबकि इसी 45 साल में केन्द्र सरकार के कर्मचारियों का वेतन 120 गुना बढ़ा और सरकारी अध्यापकों का वेतन 320 गुणा बढ़ा, साथ ही कार्पोरेट महकमों में आमदनी 1000 गुणा तक बढ़ी, वहीं इसी समय स्कूल और इलाज के खर्चों पर 300 गुणा की बढ़ोत्तरी हुई। इस विशलेषण के तहत किसानों की आमदनी न के बराबर बढ़ी है और खर्चें का बोझ अत्याधिक। अगर गेहूँ का मूल्य भी कम से कम 100 गुणा (सोने के भाव के समानुपात) बढ़ा होता तो उसे 8000 से 10,000 रूपया प्रति क्विंटल तक मिलता और वो खेती छोड़ने को विवश न होता। यही हाल अन्य फसलों का भी है। 2016 में जहाँ तूअर दाल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5050 रूपया प्रति क्विंटल निर्धारित हुआ वहीं देशभर में किसानों को 4200 रूपया से ज्यादा भाव नहीं मिला। जबकि कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग के मुताबिक कुल उत्पादन लागत 6403 प्रति क्विंटल है, इसकी तुलना उस कीमत से कीजिए जो उसे बाजार में मिल रही है। स्थिति तब और खराब हो गई जब मल्लिकार्जुन खडगे (लोकसभा में कांग्रेस के नेता) के मुताबिक सरकार ने 10114 रूपय प्रति क्विंटल की दर पर 27.86 लाख टन तुअर दाल आयात की, साथ ही मोदी जी अफ्रीका के किसानों को वायदा 

करके आए हैं कि आप कितनी भी दाल उगाओं इससे भी अच्छे दाम पर हम खरीद करेंगे। तुअर दाल अपवाद नहीं है, मूंग और चने सहित सभी दलहन के मामलों में जो हुआ वह भयावह है। सरसों का उत्पादन अच्छी जलवायू के चलते बढ़ने के कारण एमएसपी 3700 रूपया भी किसानों को मिल न सका। उत्तेजित उत्पादकों द्वारा टमाटर, आलू और प्याज को सड़कों पर फेंकने की कई घटनाएं सुर्खियां बनी और आंध्र प्रदेश और तेलंगना की नकद फसल मिर्ची का भी यही हाल हुआ।

आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified)

मोनसेंटो जैसी विदेशी कम्पनियां हमारे देशी बीजों को खत्म कर निम्न स्तर के गुणसूत्राीय बदलाव वाले बीजों के माध्यम से हमारी खेती और रसोई पर पूर्णतय कब्जा करने के लिए तैयार है और इसमें हमारी सरकारें पूरी तरह से उनकी सहयोगी हैं। 

हाल ही में केन्द्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि बस एक बार इस जीएम मस्टर्ड के उत्पादन को पर्यावरण बन और जलवायू मन्त्रालय की अनुमति मिल जाए तो उनका मंत्रालय खुद ही इसकी पैदावार शुरू कर देगा जबकि कृषि नियामकों के हिसाब से इसको कूड़े के डिब्बे में फेंक देना चाहिए। जीएम प्रजाति न तो बेहतर पैदावार दे सकती है और न ही बेहतर गुणवत्ता का तेल, तो फिर मंत्रालय को इसे अनुमति देेने की वजह साफ करनी चाहिए। इस वर्ष भारत में सरसों का रिकार्ड उत्पदान हुआ है, और वो भी जीएम प्रजाति लागू किए बिना। विज्ञान के नाम पर कम्पनियों के व्यावसायिक हित साधने के लिए अक्सर झूठे वायदे किए जाते हैं और अभी ऐसा ही झूठ ये फैला रहे है कि ये सरसों की ये किस्म 30 प्रतिशत पैदावार बढ़ा देगी, जोकि सरासर गलत है और ऐसा न होने पर ये किसानों को ही दोषारोपन कर देते हैं। जैसे पंजाब में बीटीकाॅटन (कपास प्रजाति) की फसल खराब होने पर कह दिया गया कि उन किसानों को वो किस्म ठीक से उगानी नहीं आई। वैसे सोसाइटी आॅफ आॅयलसीड रिसर्च (फरवरी 20, 2015) द्वारा आयोजित सम्मेलन में डा0 वाई.एस सोढ़ी ने अपनी प्रस्तुति में दिखाया कि सरसों की ऐसी कम से कम पांच किस्में हैं जो जीएम नहीं है और जिनकी पैदावार डीएमएम-11 से ज्यादा है। प्रोफेसर पार्थ सारथी कहते हैं कि ‘‘बनावट के दिए गए आंकड़ों के हिसाब से डीएमएच-11 मस्टर्ड के बीचों से निकला तेल भी घटिया होगा। 

उन्होंने साफ तौर पर कहा, जीएम किस्म को लागू करने का कोई खेती सम्बंधी फायदा नहीं है। बल्कि ये तो भारत की कृषि, भोजन, स्वास्थ्य और समृद्ध जैविक विविधता को नुकसान पहुँचाने वाला है। इसके स्वास्थ्य समबंधी प्रभावों को जानने के लिए जानवरों पर परीक्षण तक नहीं किए गए। ऐसे में मंत्रालय को इसकी अनुमति देने की वजह साफ करनी चाहिए। सरसों का रिकार्ड उत्पादन (3 करोड़ 36 लाख टन) होने के बाद ये बात स्पष्ट है कि चुनौति केवल उत्पादकता बढ़ाने की ही नहीं है। कृषि मंत्रालय किसानों को वाजिब दाम नहीं दे पा रहा है।
कर्ज का खूनी फंदा

एन.सी.आर.बी के आंकड़ों के मुताबिक कर्ज न चुका पाने के कारण खुदखुशी करने वाले किसानों में से 80 फीसदी ने बैंको से कर्ज लिया था। कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या करने वाले किसानों की बात जब उठती है तो साहूकारों और महाजनों को अपराधी के तौर पर पेश किया जाता है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि बैंक उनसे कहीं ज्यादा कड़ा रूख वसूली के लिए अपनाते हैं, वो उन्हें बेइज्जत करने के लिए बड़े-बड़े अक्षरों में उनका नाम बिल्डगों पर लिखवाते हैं और यहाँ तक कि लोन वसूलने के लिए गुंडों तक का इस्तेमाल करते हैं।

 गरीब किसान बैंकों से कर्ज लेकर खेती करता है और जब बेमौसम बरसात, ओले और तेज हवाओें और सूखे से फसल बरबाद हो जाती है तो वो आत्महत्या करने को विवश हो जाता है। एन.सी.आर.बी के आंकड़ों के मुताबिक 1995 से 2015 तक 3,10,000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। वर्ष 2015 में किसानों पर 12 लाख करोड़ रूपये का कर्ज था। सबसे समृद्ध कहे जाने वाला प्रांत पंजाब में ही 98 प्रतिशत ग्रामीण परिवार कर्ज में डूबे हैं और इनसे से 94 प्रतिशत की आमदनी से ज्यादा खर्चे हैं। अभी-अभी योगी अदित्यनाथ सरकार ने 36,395 करोड़ रूपए का कृषि ऋण माफ करने की सिर्फ घोषणा की तो भी इस पर अर्थ शास्त्री और बिजनेस मीडिया आंख-भौ सिकौड़ रहा है। विदेशी ब्रोक्रेरेज फार्म मेरिल लिंच ने तो एक कदम आगे जाकर यह अनुमान लगाया है कि कर्ज माफी 2019 के चुनाव तक जीडीपी के 2 प्रतिशत तक पहुँच जाएगी। मुझे याद नहीं आता कि मेरिल लिंच ने कभी कोर्पोंरेट लोन माफ करने पर जीडीपी के आंकड़े दिए हों। पहले ही इंडिया रेटिंग को अपेक्षा है कि निकट भविष्य में चार लाख करोड़ रूपये का व्यापारियों का लोन माफ कर दिया जाएगा। चूँकि व्यापारियों को 2013-16 के तीन साल में 17.15 लाख करोड़ की बड़ी कर रियायत दी गई और उनको जमीन लगभग मुफ्त इस वादे के साथ दी जाती है कि पानी-बिजली भी सस्ती मिलेगी और आयकर अवकाश तो है ही और इसी का फायदा उठाते हुए विजय माल्या जैसे लोग 8000 करोड़ लेकर रफू चक्कर हो जाते हैं जो कि असलियत में किसान और मजदूर का पैसा था। कभी नहीं सुना गया कि किसी कम्पनी के दिवालिया होने पर बिजनेसमैन ने आत्मघाती कदम उठाया हो। उसकी शान-शौकत की जीवनशैली वैसी ही बनी रहती है। हल्ला तो तभी मचता है जब किसान का लोन माफ होता है (जोकि वास्तव में लोन न होके ऋण है क्योंकि उसे उसकी फसलों का वाजिब दाम जान बूझकर नहीं दिया जाता) उनसे तो शायद कर्ज के बोझ तले खूनी फंदे की ही अपेक्षा रहती है।

क्या कभी कर्जमुक्त हो पाएगा किसान?

किसान मुक्त भारत बनाने की वैश्विक परियोजना के चलते किसान का कर्ज मुक्त होना असंभव है लेकिन इस मकड़जाल को समझने की कोशिश करें तो शायद हम किसान की खुशहाली का रास्ता खोज पाएं। इस पूरे मकड़जाल को हम स्कूल में खिलाए जाने वाले कुर्सियों  के खेल से समझ सकते हैं- 

आप ऐसा मानिए 10 कुर्सियां है और बैठने वाले 12 (जिनमें किसान, व्यापारी, डाॅक्टर, सरकार, इंजीनियर इत्यादि) हैं। अब ताली बजते ही सबको बैठना है, जो रह जएगा उसको गोली मार दी जाएगी, ऐसे में इस खेल में 2 लोगों को मरना ही है क्योंकि कुर्सी सिर्फ 10 है। असलियत में ये कुर्सी आज की व्यवस्था का पैसा है। बैंक ने सरकार, किसान, व्यापारी, डाॅक्टर, इंजीनियर इत्यादि सभी को 10-10 हजार रूपये कर्ज दिया इस शर्त पर कि अगले वर्ष 1000 रूपया ब्याज सहित सभी को 11,000 रूपये लौटाने हैं, अब जब देश में पैसा कुल 10,0000 बैंक ने बनाकर दिया तो एक साल बाद वो 1,10,000 कैसे वापस कर पाएंगे? ऐसे में वो एक दूसरे को लूटंगे अगर समाज की हकीकत देखें तो सरकार पर आज 80 लाख करोड़ रूपये  का कर्ज है और वो ब्याज चुकाने के लिए जनता पर अत्यधिक टैक्स लगाती है, व्यापारी भी अपना ब्याज भरने के लिए अत्यधिक लूट के लिए नई-नई रणनीति बनाता है, डाॅक्टर भी दौड़ में बने रहने के लिए मरीज को सही करने की जगह ऐसी दवाई देता है कि वो लगातार उसका ग्राहक बना रहे, इंजीनियर भी अपनी जिंदगी सुरक्षित करने के लिए पुल आदि के निर्माण में खूब घोटाला करता है, और किसान खुद को बचाने के लिए फलों और सब्जियों में जहर मिलाने लग जाता है, अब क्योंकि पैसा बैंक ने सिर्फ 10,0000 दिया था और उसके सिवा उसको कोई बना नहीं सकता तो अगले साल 1,10,000 भरना असंभव है, तो ऐसे में किसी को अपना  खेत, घर, गाय-बैल या लड़की/औरत बेचनी पड़ेगी या तो आत्महत्या करनी पड़ेगी और अंत में सबसे ज्यादा किसान ही आत्महत्या करते हैं क्योंकि वो अपनी फसलों का दाम निर्धारित नहीं कर सकते।

आज कोई भी नेता, अर्थ शास्त्री, अधिकारी ये नहीं सोच रहा कि हम कुर्सिंयों की संख्या 10 से बढ़ाकर 15 क्यों नहीं करते जब बैठने वाले 12 हैं, मतलब भारत सरकार को कर्जमुक्त पैसा जारी करना चाहिए, क्यों हम आजाद होने के बाद भी अंग्रेजों की बनाई उसी अर्थ व्यवस्था को ज्यों का त्यों चलाने के लिए मजबूर हैं? हमारे पास किसी भी संसाधनों, श्रम या तकनीक की कमी नहीं है अगर कमी है तो सिर्फ इस कागज के टुकड़े की जोकि सत्ताधारियों द्वारा जानबूझकर बनाई गई है, जिससे कि समाज आपस में लड़ता रहे और उनकी सत्ता काबिज रहे। मुद्रा की बनावटी कमी के कारण समाज आज लालच और डर में जी रहा है और अपना धर्म और कर्तव्य भूलकर सिर्फ पैसे की लूट में लगा है। इस वैश्विक षडयंत्र में बैंको को माध्यम बनाकर किसान मुक्त भारत बनाने की परियोजना को अंजाम दिया जा रहा है। अगर हम समय से नहीं सचेत होगे तो धीरे-धीरे किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी सभी की गुलामी पर मोहर लग जाएगी।



भूमि अधिग्रहण

चौतरफा आक्रमण के बाद भी अगर कोई किसान अपनी खेती छोड़ने को तैयार नहीं होता तो डंडे के जोर से उसकी जमीन छीनने की तैयारी है लोग अभी भी धरती को अपनी माँ मानते हैं और भावनात्मक रूप से खुद को उससे जोड़े हुए है लेकिन हाल ही में हमने देखा कि पूर्ण बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई मोदी सरकार ने किसानों की जमीन छीनने के लिए भूमि-अधिग्रहण अधिनियम पारित करने की कोशिश की, जिसमें साल में 3-3 फसलें देने वाली उपजाऊ लाखों हेक्टेयर जमीन को सरकार किसानों की अनुमति के बिना जबरदस्ती अधिग्रहित कर रही थी। उनके कार्पोरेट माॅडल के हिसाब से पूरे देश को 19 भागों में विभाजित किया गया है और बताया जा रहा था कि 5 से 10 हजार हेक्टेयर के बड़े फार्म बनाकर अमेरिका, आस्ट्रेलिया की विदेशी कम्पनियों को दिया जाएगा। जोकि बड़ी-बड़ी मशीनों से खेती करेंगे क्योंकि हमारे किसान जिनके पूर्वज हजारों सालों से खेती करते आए हैं, वो आज खेती करना भूल गए हैं। अब सिर्फ विदेशी कम्पनियों के भरोसे खेती होगी जिसमें हम उनके गुलाम बनकर नौकरी करेंगे। इस तरह से हमारे रसोई के साथ-साथ जमीन के अन्दर बसे प्राकृतिक संसाधनों पर भी उनका कब्जा हो जाएगा। इस तरह सदा-सदा के लिए भारत के वीर और परिश्रमी किसान उनके गुलाम बन जाएंगे और उनका किसान मुक्त भारत बनाने का सपना पूरा होगा।
- चौधरी प्रताप सिंह