Thursday, 30 July 2015

जीएसटी

अभी हाल ही मे भारतीय सरकार ने तय किया है कि वस्तु ‍एवं सेवा कर (जीएसटी) को भारतीय व्यवस्था मे शामिल किया जाऐगा। यह भारतीय सरकार द्वारा अमीर लोगों के पक्ष मे एक और कदम है। भारतीय सरकार का कहना है कि वह जीएसटी का समर्थन इसलिए कर रही है क्युंकि ऐसा करने से पैसा, मजदूर और व्यापार की वस्तुओं का मुक्त रुप से संचार होगा और वह भी विभिन्न राज्यों द्वारा लगाई गई बाधाओं के बिना।

भारतीय सरकार के इस कदम का मूल्यांकन करने से पहले जरूरी है कि हम जीएसटी का मतलब जानें। इसलिए मैं यहाँ वस्तु एवं सेवा कर का संिक्षप्त मे वर्णन करता हूं।

जीएसटी के अधीन, केंद्रीय सरकार सभी वस्तुओं पर सिर्फ़ एक ही कर लगाऐगी और राज्यों के पास कर इकट्ठा करने का कोई अधिकार नहीं रहेगा। केंद्रीय सरकार का कहना है कि इस जिएसटी कर को इकट्ठा करके वह हर राज्य को उसकी जरूरत के अनुसार राजस्व देगी।

अब समय है कि भारतीय सरकार के इस निर्णय का विस्तार से मूल्यांकन किया जाए और इस मुद्दे पर चर्चा की जाऐ कि कैसे यह जीएसटी हमारी व्यवस्था को नष्ट कर देगा।

सबसे पहले यह जीएसटी हमारे देश के सभी राज्यों की प्रधानता को नष्ट कर देगा। जब मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कई बार कहा था कि हमारी व्यवस्था मे विकेन्द्रीकरण की बहुत जरूरत है जिससे कि हर राज्य के अपने अधिकार हों। लेकिन भारत का प्रधानमंत्री बनते ही उनकी सोच मे अचानक इतना बदलाव कैसे आ गया??????

यह जीएसटी केंद्रीय सरकार के एकाधिकार को बढ़ावा देगा और यह एक कदम है सरकार के द्वारा हमारे देश को आर्थिक तानाशाही की तरफ ले जाने का। यह कदम राज्य सरकार से उसके राजस्व को इकट्ठा करने का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत को उससे छीन लेगा और उसके बाद, राज्य सरकार पूरी तरह से केंद्रीय सरकार पर निर्भर हो जायेगी अपने विकास परियोजनाओं को लेकर। यह भी हो सकता है कि केंद्रीय सरकार राजस्व के आवंटन मे पक्षपात करे। और यह भी संभव है कि हर केंद्रीय सरकार उन राज्यों को ज्यादा धन दे जिन राज्यों मे उसकी अपनी पार्टी की सरकार है।

एक केंद्रीय सरकार हमेशा चाहेगी कि वह कर को कम से कम रखे क्युंकि जीएसटी के लागु होने के बाद उसके पास हमारे देश की आर्थिक पर्णाली पर पूर्ण रूप से एकाधिकार होगा। वहीं दूसरे तरफ कराधान शक्तियों का राज्य सरकार के पास विकेन्द्रीकृत होने की वजह से कर प्रतिद्वन्दता को हासिल करने में कामयाबी मिलेगी जिसकी जरूरत कर दरों को कम करने के लिए अत्यावश्यक है। हमारे देश के वित्त मंत्री को यह समझना चाहिए कि पिछले दशक में भारत के विभिन्न राज्यों के बीच प्रतिद्वन्दता ही अधिक निवेश और आर्थिक विकास का मुख्य कारण है।

विभिन्न यूरोपीय देशों के बीच कराधान प्रणाली में प्रतिद्वन्दता ही पिछले दशकों में वहाँ के विकास का मुख्य कारण रहा है। पश्चिमी यूरोप के कई देश अपने कर की दर को कम रखते हैं क्युंकि पूर्वी यूरोप के दे‍शों में कर की दर कम है इसलिए निवेश को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए पश्चिमी यूरोप के देश अपनी कर की दर को कम रखते हैं। यही कारण है कि जीएसटी हमारे देश राज्यों के बीच की प्रतिद्वन्दता को खत्म कर देगी।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जीएसटी के तहत सभी वस्तुओं पर एकसमान कर होगा। जीएसटी के अंतर्गत सिगरेट पर भी वही कर होगा जो कि फ्रूट जूस पर है। हमें एक ऐसी कर प्रणाली कि जरूरत है जिसके अंतर्गत हर उस वस्तु पर, जो स्वास्थ्य और समाज के लिए हानिकारक है, उसपर अधिक कर हो। जिससे कि हमे सिगरेट पर ज्यादा औेर फ्रूट जूस पर कम कर देना पढे। ऐसा करने से एक फायदा यह होगा की सिगरेट थोडी महंगी हो जाऐगी और कुछ प्रतिशत लोग शायद सिगरेट पीना छोड दें।

जीएसटी की एक और बुरी बात यह है कि इसके अधीन अमीर लोगों को दस हाजार रुपऐ के एक जूते के लिऐ उतना प्रतिशत ही कर देना होगा जितना किसी हम ओर आप जैसे आम इंसान को किसी दो सौ रुपऐ के जूते के लिऐ देना पढेगा। हमें ऐसे एक प्रणाली की जरुरत है जिसके अधीन हमारे देश के विकास में एक अमीर और गरीब का बराबर का योगदान हो। हम इसे इस तरह समझ सकते हैं कि मान लो एक अमीर आदमी दस हजार के जूतों के लिऐ दो प्रतिशत कर देता है अर्थात् वह अमीर आदमी दो सौ रुपऐ कर के रूप मे अदा कर रहा है और वहीं एक गरीब आदमी दो प्रतिशत कर देता है किसी सौ रुपऐ के जूतों के लिऐ अर्थात् दो रुपऐ। यहाँ दो सौ रुपऐ उस अमीर आदमी के लिऐ नगण्य है जिसकी आमदनी एक करोड़ रुपऐ है जबकि दो रुपऐ उस गरीब आदमी के लिऐ बहुत बडी रकम है जिसकी आमदनी मात्र एक हजार रुपऐ है। यह दो रुपऐ उस गरीब आदमी पर काफी हद तक प्रभाव डालेंगे। इसलिये कर का किसी वस्तु के दाम के अनुसार होना जरूरी है। जूते की खरीद किसी अमीर आदमी के द्वारा और किसी गरीब आदमी के द्वारा एकसमान नहीं है। अतः जीएसटी का यह एक और बुरा उदाहरण है।

कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह का कराधान संभव नहीं है जहाँ अमीरों के लिऐ ज्यादा कर हो और गरीबों के लिऐ कम। ऐसे लोगों को मैं फिनलैंड की कराधान प्रणाली के बारें मे पढने की सलाह दूँगा। फिनलैंड मे हालही मे घटित हुई एक घटना का मैं यहाँ विवरण करना चाहूँगा। 3 मार्च 2015 को एक फिनिश आदमी पर गति के नियम का उल्लंघन करने पर 54,000 यूरो का जुर्माना लगाया गया। गौरतलब है कि फिनलैंड में जुर्माना आय से जुड़ा होता है और जुर्माने का हिसाब उस अपराधी की दैनिक कमाई से होता है। यहाँ अपराधी का नाम Reima Kuislawho था जिसे पुलिस ने 103 km/h की स्पीड पर गाडी चलाते हुऐ पकडा था। तब अधिकारियों ने उसकी 2013 की कर विवरणी की जांच की और पाया कि उसने 2013 मे 6.5 मिलियन यूरोस कमाऐ थे। अतः उन्होंने उस अपराधी को उसकी कमाई के अनुसार जुर्माना लगाया। अगर उसकी 2013 की कमाई कम होती तो अधिकारियों द्वारा उस पर कम जुर्माना लगाया गया होता। इसी तरह की एक और घटना में 2012 में नोकिया में काम करने वाले एक कार्यकारी को तेज गति से बाइक चलाने पर 116,000 यूरो का जुर्माना लगाया था। उस कार्यकारी को इतना ज्यादा जुर्माना उसकी आय की वजह से लगा था जो की 14 मिलियन यूरो थी।

मेरे हिसाब से जुर्माना और कर लगाने के पीछे सबसे बढा उद्देश्य हमें यह अहसास दिलाना होता है कि हमारे देश कि विकास मे हमारे योगदान की भी जरूरत है और साथ ही हमारे अंदर यह चेतना जगाना कि हमे अभी इस देश का बहुत सा कर्ज अदा करना है। इसलिये कर का भुगतान आदमी की आय के अनुसार होना चाहिए। एक अमीर आदमी को ज्यादा कर अदा करना चाहिए और देश के विकास मे बराबर का योगदान देना चाहिए।


हमारी मोदी सरकार से गुजारिश है कि वह इस देश के गरीब लोगों पर भी बराबर ध्यान दे। जेटली जी को भी यह बात ध्यान मे रखना चाहिए कि भारत में आज भी अधिकतर लोग गरीबी रेखा से नीचे ही  जीवन व्यापन कर रहे हैं और उनमें से ज्यादातर लोग गाँवों मे रहते हैं। मोदी जी आपको हम गरीब लोगों की भी देख-रेख करनी है क्युंकि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो हो सकता है कि ये भारत की जनता आपको भी उसी तरह से सत्ता से निकाल कर बाहर फेंक दे जैसे कि 2014 में कांग्रेस के साथ हुआ था।

साम्राज्यवादी ताकतें

कुछ समय से पूरे विश्व को काबू में करने ले लिए एक नये तरीके का इस्तेमाल साम्राज्यवादियों ताकतों द्वारा किया जा रहा है और वो है लोकतंत्र के नाम पर दूसरे देशो के आंतरिक मामलो में अमरीका व् पश्चिमो देशों का हस्तक्षेप | 1970 तक सी आई ए उन सभी देशों में  सीधे तख्तापलट करने की साजिश रचती थी जो अमरीका की नीतियों का विरोध करते थे लेकिन 1970 के दशक में सी आई ए की ऐसी कई घटनाओं में संलिप्ता दुनिया के सामने उजागर हुई जिन्होंने पूरे अमरीका को शर्मसार कर दिया | इन घटनाओं में प्रमुख थी वाटरगेट स्कैंडल में सी आई ए की भूमिका, 1953 में ईरान में एक लोकतान्त्रिक सरकार का तख्तापलट, 1960 में सी आई ए के आदेश पर कुछ माफियाओं द्वारा क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो को ज़हर देने की कोशिश और चिली में सी आई ए द्वारा एक लोकतान्त्रिक सरकार के राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे की हत्या | इसके बाद अमरीकी सरकार ने निर्णय लिया कि सी आई ए की ऐसी गतिविधियों पर रोक लगा दी जाये और उन्होंने इन कामों को अंजाम देने के लिए 1983 में एक नया संगठन बनाया और उसको नाम दिया गया “नेशनल एन्दोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी” और इसको कानून में बदला अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने | आज के दिन अमरीकी नीतियों का विरोध करने वालों देशों में अव्यव्स्था फ़ैलाने का ज़िम्मा इसी संगठन के ऊपर है | सी आई ए के बारे में तो शायद हर कोई जनता है लेकिन इस संगठन के बारे में बहुत ही कम लोगों ने सुना है और इसी लिए इसके बारे में जानना बहुत ज़रूरी है क्योंकि हम अपने विरोधी को जब ही शिकस्त दे सकते हैं जब हम उसकी गतिविधियों के बारे में जानते होंगे |

नेशनल एन्दोव्मेंट फॉर डेमोक्रेसी का मुख्य काम है अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों का पुरे विश्व में प्रचार-प्रसार और उनको अमल में लाने के लिए किसी भी देश में लोकतांत्रिक सरकार को अपने गैर सरकारी संगठनों (NGO)  के ज़रिये उखाड़ फेंकना | अमरीकी सरकार द्वारा इसे फंडिंग प्राप्त होती है और इसकी ताकत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इस की गतिविधियों पर अमरीकी राष्ट्रपति भी पूरी तरह से रोक नही लगा सकते | नेशनल एन्दोव्मेंट फॉर डेमोक्रेसी के पहले प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने 1991 में खुद ये बात स्वीकार की थी कि जो काम 20 साल पहले सी आई ए करती थी, वो आज उसी काम को आगे बढ़ा रहे हैं |  इसके काम को हम दो घटनाओं से और अच्छी तरह से समझ सकते हैं | पहली घटना है सर्बिया में एक युवा संगठन “ओटपोर” के ज़रिये सर्बियाई राष्ट्रपति स्लोबोडान मिलोसेविक की सरकार का तख्तापलट | खुद नेशनल एन्दोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी के कागजों के अनुसार अगस्त 1999 से उसने लगातार “ओटपोर” को आर्थिक सहायत प्रदान करके मिलोसेविक के खिलाफ सर्बिया में प्रदर्शन आयोजित करवाये | स्लोबोडान मिलोसेविक फेडरल रिपब्लिक ऑफ़ यूगोस्लाविया के 1997 से 2000 तक  राष्ट्रपति रहे और जब 1999 में नाटो द्वारा यूगोस्लाविया के ऊपर बमबारी की जा रही थी तो उस समय पर वो ही यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति थे | मार्च  24, 1999 से जून 10, 1999 तक नाटो ने यूगोस्लाविया पर भीषण बमबारी की लेकिन फिर भी वो मिलोसेविक को पद से नही हटा पाए | मिलोसेविक अमरीकी नीतियों के धुर विरोधी थे और इसलिए बमबारी के दौरान 1999 मे अमरीकी समर्थित इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने उनके ऊपर युद्ध अपराध के आरोप लगाये और उनके खिलाफ वारंट जारी कर दिया | बमबारी के पूर्ण रूप से सफल न होने पर “ओटपोर” के ज़रिये मिलोसेविक के खिलाफ प्रदर्शन करवाये और  अक्टूबर 7, 2000 को मिलोसेविक ने इस्तीफा दे दिया | इनके बाद अमरीका के सहयोग से राष्ट्रपति  पद पर काबिज़ हुए “वोजिस्लाव कोस्तुनिका” के आदेश पर “मिलोसेविक” को बिना किसी पुख्ता सबूत के गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये लेकिन अदालत में मिलोसेविक के ऊपर लगाये गये सभी आरोप झूठे साबित हुए| “ओटपोर” ने मिलोसेविक की गिरफ़्तारी के लिए अमेरिका से आदेश मिलने के बाद सर्बियाई सरकार पर दबाव बनाया |  

लोकतान्त्रिक सरकारों को उखाड़ फेंकने के नये अमरीकी हथियार

कुछ समय से पूरे विश्व को काबू में करने ले लिए एक नये तरीके का इस्तेमाल साम्राज्यवादियों ताकतों द्वारा किया जा रहा है और वो है लोकतंत्र के नाम पर दूसरे देशो के आंतरिक मामलो में अमरीका व् पश्चिमो देशों का हस्तक्षेप | 1970 तक सी आई ए उन सभी देशों में  सीधे तख्तापलट करने की साजिश रचती थी जो अमरीका की नीतियों का विरोध करते थे लेकिन 1970 के दशक में सी आई ए की ऐसी कई घटनाओं में संलिप्ता दुनिया के सामने उजागर हुई जिन्होंने पूरे अमरीका को शर्मसार कर दिया | इन घटनाओं में प्रमुख थी वाटरगेट स्कैंडल में सी आई ए की भूमिका, 1953 में ईरान में एक लोकतान्त्रिक सरकार का तख्तापलट, 1960 में सी आई ए के आदेश पर कुछ माफियाओं द्वारा क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो को ज़हर देने की कोशिश और चिली में सी आई ए द्वारा एक लोकतान्त्रिक सरकार के राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे की हत्या | इसके बाद अमरीकी सरकार ने निर्णय लिया कि सी आई ए की ऐसी गतिविधियों पर रोक लगा दी जाये और उन्होंने इन कामों को अंजाम देने के लिए 1983 में एक नये हथियार के रूप में एक संगठन बनाया जिसे नाम दिया गया “नेशनल एन्दोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी” और इसको कानून में बदला अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने | आज के दिन अमरीकी नीतियों का विरोध करने वालों देशों में अव्यव्स्था फ़ैलाने का ज़िम्मा इसी संगठन के ऊपर है | सी आई ए के बारे में तो शायद हर कोई जनता है लेकिन इस संगठन के बारे में बहुत ही कम लोगों ने सुना है और इसी लिए इसके बारे में जानना बहुत ज़रूरी है क्योंकि हम अपने विरोधी को जब ही शिकस्त दे सकते हैं जब हम उसकी गतिविधियों के बारे में जानते होंगे |
नेशनल एन्दोव्मेंट फॉर डेमोक्रेसी का मुख्य काम है अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों का पुरे विश्व में प्रचार-प्रसार और उनको अमल में लाने के लिए किसी भी देश में लोकतांत्रिक सरकार को अपने गैर सरकारी संगठनों (NGO)  के ज़रिये उखाड़ फेंकना | अमरीकी सरकार द्वारा इसे फंडिंग प्राप्त होती है और इसकी ताकत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इस की गतिविधियों पर अमरीकी राष्ट्रपति भी पूरी तरह से रोक नही लगा सकते | नेशनल एन्दोव्मेंट फॉर डेमोक्रेसी के पहले प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने 1991 में खुद ये बात स्वीकार की थी कि जो काम 20 साल पहले सी आई ए करती थी, वो आज उसी काम को आगे बढ़ा रहे हैं |  इसके काम को हम एक घटना से और अच्छी तरह से समझ सकते हैं | यह  घटना है सर्बिया में एक युवा संगठन “ओटपोर” के ज़रिये सर्बियाई राष्ट्रपति स्लोबोडान मिलोसेविक की सरकार का तख्तापलट | स्लोबोडान मिलोसेविक फेडरल रिपब्लिक ऑफ़ यूगोस्लाविया के 1997 से 2000 तक  राष्ट्रपति रहे और जब 1999 में नाटो द्वारा यूगोस्लाविया के ऊपर बमबारी की जा रही थी तो उस समय पर वो ही यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति थे | मार्च  24, 1999 से जून 10, 1999 तक नाटो ने यूगोस्लाविया पर भीषण बमबारी की लेकिन फिर भी वो मिलोसेविक को पद से नही हटा पाए | मिलोसेविक अमरीकी नीतियों के धुर विरोधी थे और इसलिए उनके मुल्क पर बमबारी की और बमबारी के दौरान 1999 मे अमरीकी समर्थित इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने उनके ऊपर युद्ध अपराध के आरोप लगाये और उनके खिलाफ वारंट जारी कर दिया | बमबारी के पूर्ण रूप से सफल न होने पर अमरीका ने “ओटपोर” के ज़रिये मिलोसेविक के खिलाफ प्रदर्शन करवाये और  अक्टूबर 7, 2000 को मिलोसेविक ने इस्तीफा दे दिया | खुद नेशनल एन्दोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी के कागजों के अनुसार अगस्त 1999 से उसने लगातार “ओटपोर” को आर्थिक सहायत प्रदान करके मिलोसेविक के खिलाफ सर्बिया में प्रदर्शन आयोजित करवाये | इसके बाद अमरीका के सहयोग से प्रधानमंत्री पद पर काबिज़ हुए “जोरन द्जिन्द्जिक” के आदेश पर “मिलोसेविक” को बिना किसी पुख्ता सबूत के गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये लेकिन अदालत में मिलोसेविक के ऊपर लगाये गये सभी आरोप झूठे साबित हुए | “ओटपोर” ने मिलोसेविक की गिरफ़्तारी के लिए अमेरिका से आदेश मिलने के बाद सर्बियाई सरकार पर दबाव बनाया | इस दबाव के कारण सर्बिया के नये प्रधानमंत्री ने मिलोसेविक को दोबारा गिरफ्तार कर इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया | नीदरलैंड के शहर हेग में स्थापित इस कोर्ट में जब मुकदमा शुरू हुआ तो मिलोसेविक ने कोई भी वकील लेने से मना कर दिया क्योंकि वे इस कोर्ट को गैरकानूनी मानते थे क्योंकि यह कोर्ट बिना संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के बनाया गया था | 2006 में जब ये स्पष्ट हो गया कि मिलोसेविक किसी भी तरह से दोषी नही हैं तो पश्चिमी जासूसी एजेंसियों ने जेल में ही उनको ज़हर देकर मार दिया | 11 मार्च 2006 को अपनी मौत से 3 दिन पहले उन्होंने रूस के दूतावास को भेजे एक पत्र में लिखा की उनको शक है की उन्हें लगातार ज़हर दिया जा रहा है | इसके बाद नये सर्बियाई प्रधानमंत्री जोरन द्जिन्द्जिक और “ओटपोर” ने आर्थिक, न्यायिक, रक्षा और मीडिया सुधारों के नाम पर पुरे देश को अमेरिका के हवाले कर दिया और इस तरीके से नेशनल एन्दोव्मेंट फॉर डेमोक्रेसी ने अपना एक मिशन पूरा करते हुए एक और देश को अमरीकी साम्राज्यवादियों का गुलाम बना दिया | इसके बाद सर्बिया में शुरू हुआ पश्चिमी कॉर्पोरेट जगत द्वारा आम जनता का बेतहाशा शोषण जो आज तक जारी है |

ऐसे और भी कई संगठन हैं जिनके द्वारा अमरीका दुसरे मुल्कों पर नज़र रखता है और उन में अव्यवस्था फैलाता है | उनकी चर्चा हम अगले लेख में करेंगे और इनकी गतिविधियों को और अच्छे तरीके से समझने की कोशिश करेंगे क्योंकि जानकारी ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है |

युवाओं से विशेष बात – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ

आज जब भारत राष्ट्र संकटों के दौर से गुजर रहा है तो ऐसे में छात्रों और नौजवानो पर एक बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है कि वे संगठित होकर संकलपित होकर भारत को इस दौर से बाहर निकालें | इतिहास गवाह रहा है की जब जब इस देश की आन-बान-शान पर किसी ने आँख उठाया है तो छात्रों और नौजवानो ने उनका डटकर सामना किया है और विजय प्राप्त की है | इतिहास के पन्नो को पलटने पर एक ऐसा लेख प्राप्त होता है, जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा है की, “अगर युवाओं को स्वाभिमानी इंसान के रूप में बने रहना है और एक महान देश के नागरिक के रूप में अपने भावी जीवन की तैयारी करनी है, तो युवाओं को अपना संगठन बनाना चाहिए | संगठन को शारीरिक, बौधिक, तथा नैतिक प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए ताकि युवा व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से बेहतर मनुष्य तथा बेहतर नागरिक बन सके |
इसी क्रम में नेताजी का 16 मई 1923 को दिया गया भाषण आज के इस दौर में भी प्रासंगिक है, जिससे युवा मन को निश्चित ही सन्देश प्राप्त होगा और उनमें नई उर्जा का सृजन होगा | इस युवा उर्जा की सहायता से हम युवा, भारत में फैले अँधेरे को छांटकर प्रकाश का उदय करने में कामयाब हो पायेंगे |   
“हमारा जनम इस विश्व में एक उद्देश्य की पूर्ती के लिए हुआ है – एक सन्देश के लिए जैसा की सूर्य का उदय विश्व को प्रकाश देने के लिए होता है , जंगल में फूल सुगंध बिखेरने के लिए खिलते हैं, नदियाँ समुद्र कि ओर अपने जल का उपहार लेकर चलती हैं | उसी प्रकार हम भी इस प्रथ्वी पर अपनी युवा शक्ति और आनंद के साथ एक सच की स्थापना के लिए आये हैं | इस अनजान और रहस्यात्मक उद्देश्य, जिससे हमारा यह निरुद्देदश्यपूर्ण जीवन सार्थक हो जाता है, कि हमें खोज करनी चाहिए और इसकी खोज अपने जीवन में किये गए कार्यों से, अनुभव और चिंतन के माध्यम से होनी चाहिए |
तरुणाई के इस तेज प्रवाह ने हमें आनंद के रसस्वादन के योग्य बनाया है क्योंकि हम उस आनंद स्वरुप की अभिव्यक्ति हैं | हम इस पृथ्वी पर आनंद के प्रतीक बनकर विचरण करेंगे | हम अपने अन्तःस्थल में रचे बसे आनंद में निमग्न होकर पूरे जग को आनंदमय कर देंगे | जिस भी दिशा में हम जायेंगे वहां से कष्ट स्वंयमेव समाप्त हो जायेंगे | हमारे जीवनदायक स्पर्श से रोग, दुःख तकलीफ सब दूर हो जायेंगे |
हम इस अश्रपूरित संसार को, इस कष्टपूर्ण जग को आनंद से सरोबार कर देंगे |
हम इस संसार में आशा, उत्सर्ग और नायकत्व की भावना से आये हैं | हम यहाँ नया सृजन करने आये हैं क्योंकि सृजन में ही आनंद है | हम अपने तन, मन, जीवन और बुद्धि को उत्सर्ग कर देंगे | हमारी सब अच्छाई, सत्यता और देवत्व हमारी सृजनशीलता में अभिव्यक्त होंगे | हम आत्मोत्सर्ग से प्राप्त आनंद से पूरी तरह भीगे होंगे और पूरा विश्व हमारे उस आनंद से लाभान्वित हो सकेगा |
जो कुछ भी हम कर सकते हैं उसका कोई अंत नहीं है, जो कुछ भी हम दे सकते हैं उसका भी कोई अंत नहीं है क्योंकि जितना अधिक त्याग हम करेंगे | हमारा जीवन उतने ही अधिक वेग से प्रभावित होगा |
हमारे पास शास्वत आशा, असीमित उत्साह, अतुलित उर्जा तथा अडिग साहस है, इसलिए कोई हमें हमारे पथ से विचलित नहीं कर सकता | हमारे सम्मुख चाहे निराशा और अविस्श्वास की बाधाये ही क्यों न आ जाये |
हमारा अपना एक विशेष धर्म है और हम उसी के सिद्धान्तों का अनुशरण करते हैं | जो कुछ भी नया है, महत्वपूर्ण है और जिसे अभी तक देखा परखा नहीं गया है, हम उसी के हिमायती हैं | हम पुराने में नयापन, चलायमान को स्थायित्व, अपरिपक्व को परिपक्वता तथा अनिश्चितता को निश्चितता प्रदान करते हैं | हम इतिहास द्वारा प्रदत पुराने अनुभवों को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करते | निस्संदेह हम अमरता के यात्री हैं फिर भी हम अनजान राहों पर चलना पसंद करते हैं क्यूंकि हमे अपरिचित भविष्य के प्रति प्यार है | हमें गलतियाँ करने का अधिकार मिलना चाहिए इसलिए बहुत से लोग हमारे साथ सहानुभूति नहीं रखते | काफी लोगों की नज़रों में हम उपद्रवी हैं |
 लेकिन इसी में हमारा आनंद निहित है और इसी में हमारा गौरव | युवा मन सब जगह और सदा ही उपद्रवी और हठी होता है | जब हमारी  इच्छाएं पूरी नहीं होती तब हम अथक रूप से आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं और उस समय हमें कोई उपदेश सुनने की फुर्सत नहीं होती | हम गलतियाँ करते हैं, भूलों के भवंरजाल में फंसते हैं, ठोकर खाते हैं, लेकिन कभी भी हम अपना उत्साह नहीं छोड़ते और पीछे मुड़कर नहीं देखते | जो हम अशांती और उपद्रव उत्पन्न करते हैं उसका कोई अंत नहीं है | क्योंकि हम सदा ही गतिशील हैं |
यह हम ही हैं जो देश-देश में स्वतंत्रता का इतिहास लखते हैं | हम यहाँ पर शांति का मरहम नहीं लगाने आये हैं | हम यहाँ संघर्ष का सन्देश देने, एक नई क्रांति को जन्म देने तथा एक उथल पुथल मचाने आये हैं |
हम अपने शारीरिक और मानसिक शक्ति के गठजोड़ से कैसे कैसे आश्चर्य कर सकते हैं इसके लिए बेबिलोनिया, फौनेसिया, असीरिया, मिश्र, ग्रीक, रोम, टर्की, इंग्लैंड, फ़्रांस, जर्मनी, रूस, चीन, जापान, तथा हिन्दुस्तान या कोई भी अन्य देश हो इनका इतिहास पढ़ना होगा | इनके इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर हम युवाओं की उपलब्धियों की गाथा स्वर्ण अक्षरों में अंकित मिलेगी | सभी सम्राट अपनी अपनी गद्दी छोड़ने को विवश हैं क्योंकि उसे हमने इसका संकेत दिया है | एक ओर हमने ताजमहल का निर्माण किया है जो पत्थरों में तलाशा गया है, असीम प्रेम का प्रतीक है, और दूसरी ओर हमने इस प्रथ्वी को रक्त रंजित भी किया है  | अपनी संगठित शक्ति से हमने समाज, राज, साहित्य, कला, और विज्ञान का निर्माण अनेक युगों में विभिन्न देशों में किया है और जब हमने रौद्र ( विध्वंशक ) रूप धारण किया और हमने विनाश लीला प्रारंभ की तो अनेक समाज और साम्राज्य धूल-धूसरित हो गए |
अनेक युगों के बाद हमे अपनी शक्ति का आभास हुआ | हम यह पह्चान करने योग्य हुए कि हमारा धर्म क्या है  ? अब किसमें साहस है की जो हमारा शोषण कर सके या हमारे ऊपर अपना आधिपत्य जामा सके | इस नई जागृति के बीच यह सबसे बड़ी उपलब्धि है कि युवा शक्ति अपनी उपस्तिथि का भान करा चूकी है |
यौवन की वह सोयी हुई शक्ति जीवन के हर छेत्र में देदीप्यमान है और यौवन की यह गौरवपूर्ण लालिमा और अधिक दिव्य होकर चमकेगी | युवा आन्दोलन सर्वव्यापी है, क्योंकि शाश्वत है | आज विश्व के हर देश में, विशेष रूप से जहाँ जहाँ पुरानेपन की, बुढ़ापे की काली छाया फैलती जा रही है वहां वहां युवा आगे बढ़ रहे हैं और द्रढ़ निश्चिय के साथ बागडोर संभाल रहे हैं | कौन इस बात को कह सकता कि किस दिव्य रौशनी से संसार चमकेगा ?

ए मेरे नवजीवन के युवा प्राणदाता जागो, उठो, उषा की लालिमा आसमान में दिखाई देने लगी है | 

प्रेस रिलीज़ 24 जुलाई 2015

24 जुलाई 2015 को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश/बिल के विरोध और देश में बर्बाद होती किसानी के षडयंत्रों को लेकर संसद मार्ग पर किसानो की विशाल पंचायत का आयोजन किया गया | “किसान आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय- (NAFM), द्वारा आयोजित इस सभा में देश के विभिन्न प्रान्तों के लगभग 50 संगठनों के लगभग 6,000 किसानो ने हिस्सेदारी की | इससे पूर्व 24 फरवरी को NAFM द्वारा ही संसद मार्ग पर विशाल सभा कर इस लड़ाई की शुरुआत की गई थी | इसी क्रम में इस सभा का आयोजन किया गया | सभा का संचालन कर रहे युवा क्रांति के प्रताप चौधरी ने सभा की अध्यक्षता के लिए बीकेयू ( यूपी ) के चौधरी हरपाल बिलारी, बीकेयू एकता, ( पंजाब ) के जगमोहन सिंह और बीकेयू एमपी के ईश्वरचंद त्रिपाठी को आमंत्रित किया | NAFM के ओडिशा के नेता अक्षय कुमार ने कहा कि सरकार द्वारा बारम्बार लाये जाये जा रहे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने किसानों को लम्बी लड़ाई लड़ने के लिए चुनौती दी है | सरकार की इस चुनौती को हम स्वीकार करते है | हरियाणा के नेता सत्यवीर डागर ने कहा की हम देशहित व किसान हित में लम्बी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं | युवा क्रांति के नौजवान साईं हिमांशु तिवारी ने कहा की बैंको ने एक साजिश के तहत किसानो की जमीन को बंधक बनाया है जिसके कारन वो आत्महत्या कर रहे हैं, किसान किसी भी बैंक का कोई कर्जा नहीं देगा | बिहार के नेता राघवेंद्र जी ने कहा की अगर सरकार सयुंक्त सदन बुलाती है तो किसान देशभर में व्यापक आन्दोलन करेंगे और दिल्ली का चारों तरफ से चक्का जाम कर देंगे | योगेंदर यादव ने कहा की मोदी सरकार की नीतियां किसानो के पक्ष में नहीं हैं और हम सभी मिलकर किसानो की लड़ाई लड़ेंगे | महाराष्ट्र की नेता सरोज ने कहा की नौजवानों के साथ-साथ महिलायें भी इस देशव्यापी लड़ाई में बढ़चढ़ कर भाग लेंगी | आदिवासी छेत्र की नेता माधुरी बहन ने कहा कि ये प्राक्रतिक संसाधनों की लूट की लड़ाई है और इन साम्रज्यवादी ताकतों के खिलाफ किसानो के साथ मजदूर भी पूर्ण रूपे से साथ हैं | पंजाब के किसान नेता मंजीत धनेर ने कहा की हरियाणा और पंजाब की जमीन छिन जाने पर दिल्लीवासियों को रोटी की मुस्किल हो जाएगी इसलिए इन शहरवासियों को भी इस लड़ाई को समझना होगा |
किसान आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति जी को ज्ञापन सौंपा | अंत में सभा के अध्यक्षों ने सयुंक्त रूप से एक आवाज़ में कहा की अब “किसान आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय” राज्यस्तरीय सभाएं करेगा और देश में किसानो को उनका हक़ दिलवाने के लिए सभी किसानो के बीच एकजुटता कायम करेगा |

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किसानो का मांगपत्र

१. बिना सहमति, बिना वाजिब मुआवजे के भूमि हड़पने वाला कानून वापिस लिया जाय
हम जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय समुदाय की मिलकियत को मानते है।  हम संसद के सामने विचारार्थ भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक 2015 को पूरी तरह खारिज करते हैं। हम मांग करते हैं कि इस विधेयक और इसी पर आधारित अध्यादेश को वापिस लिया जाय।अंग्रेज़ों के 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह 2013 के कानून ने जो भी सुधार किये थे, वो सब इससे निरस्त हो जायेंगे। जनांदोलनों ने लम्बे संघर्ष के बाद संसद से कुछ हक़ हासिल किये थे: अधिग्रहण से पहले सहमति की अनिवार्यता, अधिग्रहण के असर की जनसुनवाई के माध्यम से जांच, बहु-फसली जमीन को अधिग्रहण से बचाना और पांच साल तक इस्तेमाल न होने पर जमीन वापिस लौटाना।  इस विधेयक से यह सब हक़ फिर से ख़त्म हो जायेंगे।

इसी विधेयक को पिछले दरवाजे से राज्यों से पास करवाने की कोशिश का भी हम पुरजोर विरोध करते हैं। 
हम मांग करते हैं कि भूमि अधिग्रहण निम्न सिद्धांतों पर आधारित हो: 
(क) अधिग्रहण से पहले देश भर में भूमि के इस्तेमाल की नीति बने 
(ख) जहाँ तक संभव हो नयी जमीन का अधिग्रहण न हो, बहु-फसलीय जमीन को बिलकुल न छेड़ा जाय और सरकार के पास पहले से उपलब्ध जमीन को इस्तेमाल किया जाय 
(ग) भू-स्वामियों की सहमति सार्वजनिक या निजी किसी भी प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहण की पूर्व शर्त हो 
(घ) अधिग्रहण के असर की ग्राम सभा में जनसुनवाई अनिवार्य हो 
(ङ) मुआवज़ा "सर्कल रेट" के आधार पर नहीं बल्कि उस कीमत के आधार पर हो जिस पर प्रस्तावित इस्तेमाल के लिए CLU मिलने  के बाद वह जमीन बिक सकेगी 
(च) अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों को प्रस्तावित प्रोजेक्ट के मुनाफे का वाजिब हिस्सा मिले   

२. हर मेहनती किसान परिवार को इज्ज़त का जीवन जीने लायक आय की गारंटी हो: 
किसान देश की खाद्य सार्वभौमता और सुरक्षा का सिपाही है। इसलिए सरकार का कर्त्तव्य है की वो अन्नदाता को इज्ज़त की जिंदगी की गारंटी दे। मेहनत करने वाले किसान को कम से कम इतनी आय जरूर हो जिससे वो अपने खर्चे चला सके, किसी प्रकोप या बीमारी का मुकाबला कर सके और बाकी व्यवसाय या नौकरी वालों जैसा जीवन जी सके।  हम यह मांग करते है कि सरकार एक ऐसा कानून बनाये जो:
(क) यह स्वीकार करे कि किसान को एक न्यूनतम आय सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है 
(ख) इस दायित्व को पूरा करने के लिए एक स्थाई किसान आय आयोग की स्थापना करे
(ग) किसान के लिए एक न्यूनतम आय की गारंटी रेखा परिभाषित करे जो सरकारी सबसे कम तनखा पाने वाले सरकारी कर्मचारी की आय से कम ना हो (आज की मंहगाई में यह गारंटी रेखा 15,000 रुपये मासिक, या 100 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन, से कम नहीं होनी चाहिए) 
(घ)  किसानों को इस गारंटी रेखा से ऊपर रखने की व्यवस्था बनाये।  इस व्यवस्था के कई अंग हो सकते है, मसलन न्यूनतम समर्थन मूल्य,  सभी फसलों की सरकारी खरीद, सस्ता और सुलभ ऋण, सस्ती बीज-खाद-पानी-बिजली, आपदा मुआवज़ा और बाजार में मदद। न्यूनतम समर्थन मूल्य ऐसे निर्धारित किया जाय कि पांच एकड़ असिंचित या ढाई एकड़ सिंचित जोत वाले किसान को इतनी बचत हो सके। न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी 25 फसलों के लिए देश भर में लागू किया जाय। जिन किसानों की आय इस इस गारंटी रेखा से नीचे हो उन्हें सीधे सरकार भरपाई करे।
(ङ) सरकारी कर्मचारियों के सातवें  वेतन आयोग को लागू करने से पहले देश के अन्नदाता के लिए पहला किसान आय आयोग स्थापित किया जाय।   

३. फसल नुकसान का मुआवजा पूरा मिले, सभी को मिले, समय पर मिले और पारदर्शिता से तय हो
 फसलों को नुकसान होने पर आक्समिक और मनमर्जी अनुदान की बजाय तयशुदा रेट से मुआवज़ा दिया जाय ताकि किसान की आय गारंटी रेखा से नीचे न गिरे। 
(क) फसल को किसी भी तरह के नुकसान को इस योजना के अंदर रखा जाय -- इसमें प्राकृतिक आपदा, बाढ़, सुखाड़, जानवरों का हमला, महामारी, बीज या अन्य किसी तकनीकी असफलता को शामिल किया जाय। 
(ख) आपदा घोषित करने की इकाई गाँव से बड़ी न हो। 
(ग) कृषि-राजस्व विभाग द्वारा तय की गयी अनावरी की पुष्टि ग्राम सभा से करने के बाद ही मुआवज़ा तय किया जाय। 
(घ) मुआवज़े की रकम उतनी हो जितना किसान को संभावित उपज के दाम से घाटा हुआ है।  उपज के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य या बाजार भाव में जो भी ज्यादा हो उस आधार पर तय किये जाय। 
(ङ) मुआवजे का भुगतान दो महीने के भीतर हो। 
(च) बटाईदार को मुआवज़े का न्यायसंगत हिस्सा मिले। 

४. भूमिहीन खेतिहर परिवार को कम से कम २ एकड़ जमीन मिले
भूमिहीन को भूमि देना ज़मीन का सबसे अच्छा "सार्वजनिक हित" में इस्तेमाल है -- इससे उत्पादन बढ़ेगा और बेरोजगारी और गरीबी घटेगी। इसलिए बेकार पड़ी खेती योग्य जमीन, अधिग्रहित लेकिन बेकार सरकारी जमीन, भूदान और भूमि सुधार की सरप्लस जमीन और पंचमी, गैरान जैसी दलित-पिछड़े समाज के लिए आरक्षित ज़मीन से भूमिहीन परिवारों को कम से कम २ एकड़ ज़मीन दिया जाय। उन परिवारों को इस जमीन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए सहायता दी जाय। जिन भूमिहीन परिवारों को पट्टा मिल गया था, उन्हें कब्ज़ा दिलाया जाय। हर ग्रामीण परिवार को रिहाइशी जमीन सुनिश्चित करने का कानून बने। 

५. आदिवासी, ठेके पर खेती करने वाले, बटाईदार और महिला किसान के अधिकारों की रक्षा हो 
(क) आदिवासी और परम्परागत रूप से वनाश्रित अन्य समुदायों को वन अधिकार कानून के तहत मिले सभी अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू किया जाय। पांचवी सूची के तहत "पेसा" कानून को लागू कर जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय समुदाय की मिलकियत को स्वीकार किया जाय।
(ख) हर काश्तकार को पहचान पत्र दिया जाय ताकि उसे बैंक लोन, आपदा मुआवज़े और सरकारी सहायता का वाज़िब हिस्सा मिल सके। 
(ग) खेती में महिलाओं के योगदान को औपचारिक स्वीकृति देने और जमीन पर महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाया जाय।  

६. विश्व व्यापार संगठन (WTO) या अन्य किसी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते की शर्ते तय करते वक्त देश की खाद्य सार्वभौमिकता और किसान की आजीविका सबसे पहले देखी जाय। किसानों के हितों के खिलाफ किसी भी समझौते को रद्द किया जाय। 

७. किसान के बीज बचाने, बनाने और  बांटने के परम्परागत अधिकार की रक्षा हो। बीज पर किसी कंपनी का एकाधिकार ना हो। GM बीज को तब तक अनुमति न मिले जब तक वैज्ञानिक और किसान इसके पर्यावरण और सेहत पर असर के बारे में संतुष्ट न हो जाएँ।
 ८. किसान को धीरे-धीरे ऐसी खेती से मुक्त किया जाय जो खर्चीली, पराश्रित और जोखिम भरी साबित हुई है, जिससे मिट्टी और भूगर्भ जल नष्ट हो रहा है और जिससे खाने, पानी और खेत में जहर घुल रहा है। सरकार कम लागत वाली और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ खेती को इतना समर्थन दे ताकि अगले दस साल में  किसान ज़हरीली खेती से मुक्त हो सके। कृषि अनुसन्धान का अनुसन्धान का आधा पैसा इस नयी खेती पर खर्च हो। 
९. बारानी खेती वाले इलाकों में बड़े पैमाने पर सिंचाई की व्यवस्था हो। सिंचाई प्रोजेक्टों में दोषों, देरी और भ्र्ष्टाचार की जांच हो। टैंक और जोहड़ जैसे लघु सिंचाई प्रोजेक्टों और भूगर्भ जल संवर्धन पर बड़े पैमाने पर निवेश हो। बारानी खेती को प्रोत्साहन देने के लिए सूखी फसलों, चारे और मवेशी पालन को प्रोत्साहित किया जाय। 
१०. किसानो को बैंकों से एक लाख तक का लोन ब्याज मुक्त और बिना जमीन को रहन रखे मिले। यह लोन बटाईदार, ठेके के काश्तकार और महिला किसान को भी मिले। कृषि ऋण के बारे में रिजर्व बैंक के अनुदेशों का पालन हो। कृषि के लिए प्राथमिकता के आधार पर मिलने वाला लोन किसान को मिले, उसके नाम पर कंपनियों को नहीं। कृषि उपकरणों के लोन के लिए ज़मीन को रहन रखने पर पाबंदी को सख्ती से लागू किया जाय। कंपनियों की तरह किसानों के बकाया लोन की भी समीक्षा हो, साहूकार के बकाया लोन को बैंक में स्थानांतरित करने की व्यवस्था हो। 
११. सार्वजनिक वितरण व्यवस्था और उसके लिए खाद्यान्नों की सरकारी खरीद को हटाने की बजाय विकेन्द्रित कर और मजबूत किया जाय। इस व्यवस्था को ख़त्म करने की शांता कुमार समिति की सिफारिशों को नामंजूर किया जाय। 
१२. पशुपालक, दुग्ध व्यवसायी, मछली पालक और कुक्कुटपालक भी किसान हैं और इन्हे भी किसान की तरह इज्ज़त की ज़िंदगी जीने लायक न्यूनतम कमाई की गारंटी होनी चाहिए।  इन्हे भी आपदा राहत और बैंक लोन की सभी सुविधा होनी चाहिए। दूध और अण्डे आदि में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्था हो, दुग्ध सहकारिता को बढ़ावा दिया जाय और प्राइवेट कंपनियों के दाम को नियंत्रित किया जाय। गौचर और अन्य पशुओं के चरने की जमीन को अतिक्रमण से बचाया जाय, गर्मी और सूखे के वक्त सस्ता चारा उपलब्ध करवाया जाय।  कुक्कुटपालन को कुटीर उद्योग का दर्ज़ा देकर बड़ी कंपनियों के हमले से बचाया जाय। 
१३. गन्ना किसानों के बकाया भुगतान को अविलम्ब निपटाया जाय, उसके लिए सरकारी सहायता मिल मालिको को नहीं सीधे किसानो को दी जाय। 

Thursday, 16 July 2015

युवा क्रांति के बढ़ते कदम : किसान आन्दोलन की नीवं

देश के किसानो की ज़मीन छीनने वालों से सावधान !

हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार किसी कनून को न बनने देने के लिए संसद से सड़क तक बहस और प्रदर्शन हो रहे हैं और हो भी क्यों न ? ये काला कानून भारतीय किसानो की ज़मीन का स्वामित्व झूठे विकास के नाम पर विदेशी ताकतों के नाम करने का फरमान जारी कर रहा है | इस देश में ज़मीन कभी भी खरीद फरोख्त की चीज नहीं  रही ; बल्कि सभी प्राकृतिक संसाधनों जैसे ज़मीन, पानी, वायु, वनस्पति आदि पर किसी भी व्यक्ति, राजा, प्रजा, समूह, या समाज का स्वामित्व का हक स्थापित नहीं था बल्कि जिस प्रदेश में जो – जो प्रजा रह रही है, वह अपनी आजीविका के लिए व अपनी जरूरतों के लिए उस प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों का आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकती थी परन्तु अंग्रेजों ने आने के बाद अपनी कुटिल चालों से न केवल हमारी समाज व्यवस्था को तोड़ दिया बल्कि ज़मीन का स्वामित्व भी 1894 के भूमि अधिग्रहण बिल द्वारा छीनने का काम शुरू किया | तथाकथित झूठी आज़ादी के बाद जब अंग्रेजों ने अपने ही नुमाइंदों को प्रजातंत्र के नाम पर शासन करने के लिए बिठाया तो जिस देश में कृषि और गाँव अर्थव्यवस्था के मूल में थे उसी देश के किसानो को बर्बाद करने के लिए गहरे षड्यंत्र रचे गए, जिससे वो अपनी ज़मीनों को बेचने के लिए मजबूर हो जाये, एक तरफ ट्रेक्टर के नाम पर कर्ज बांटे गए, ज़मीन को अनुपजाउ बनाने के लिए भारी मात्र में सब्सिडी देकर फर्टिलाईजर्स लाये गए वहीँ दूसरी ओर मोनसेंटो जैसी कम्पनियों के बल पर बीज का स्वामित्व भी किसानो से छीन लिया और ऐसे  में जब किसानो को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलता, अनाज और चावल मंडियों में सड जाता है तो किसान कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या करता है | ऐसे में सरकार भी कहती है की खेती घाटे का सौदा है इसे छोड़ दो हम यहाँ उद्योग लगायेंगे और आपको रोजगार देंगे | जिस देश में हजारों लाखों सालों से कृषि मूल में रही आजीविका का साधन रही आज इन्होने षड्यंत्रों से इसे किसान के लिए घाटे का सौदा बना दिया | फिर भी देखिये किसान कितनी मेहनत करता है जहाँ आज पूरे देश की जरुरत 70 लाख टन गेहूं की है वहीँ 90 लाख टन गेहूं की उपज इस साल पैदा की है लेकिन फिर भी सरकार ने मक्कारी दिखाते हुए आस्ट्रेलिया से 10 लाख टन गेहूं की खरीददारी कर किसानो की फसलों को मंडियों में सड़ने के लिए मजबूर कर दिया |
इतना होने पर भी विदेशी व देशी ताकतों को सब्र नहीं है और उन्होंने देश के प्रधानमंत्री से कहा की आप जल्दी से ऐसा कानून बनाओ जिससे की हम  जलदी से ज़मीन छीन सकें | जैसे की हमने ऊपर बताया की अंग्रेजों ने 1894 में भूमि - अधिग्रहित करने के लिए एक खतरनाक कानून बनाया था | तथाकथित आज़ादी के बाद जब 1991 में वैश्वीकरण हुआ तो उसके बाद इस कानून के दम पर बड़े पैमाने पर देश में ज़मीन अधिग्रहण शुरू हुआ | कांग्रेस के कार्यकाल में ( SEZ – Special Economic Zone ) के नाम लाखों हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की गई और इसकी ज्यादातर ज़मीन आज भी ऐसे ही पड़ी है | जब पूरे देश में आवाज उठी, संघर्ष चले, किसानो ने सहादते दी तो कांग्रेस ने जाते जाते 2013 में नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाया जिसपर भाजपा के सुषमा स्वराज से लेकर राजनाथ सिंह तक सभी नेताओं कि सहमती थी | 2014 में भाजपा की सरकार आने के बाद दिवंगत गोपीनाथ मुंडे ने कहा था की जल्द ही  उनकी सरकार इस 2013 के बिल को लागु करेगी क्यूंकि ये किसानो के हित में है लेकिन उनके इस ब्यान के कुछ दिन बाद ही एक सड़क दुर्घटना में उनकी रहस्मयी मौत हो गयी | उसके बाद नितिन गडकरी जी ने कहा की ये कानून उनकी सरकार लागू नहीं करेगी और एक नया कानून लेकर आएगी जिसके माध्यम से देश का विकास होगा |
2015 की शुरुआत में जहाँ एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति हिन्दुस्तान के दौरे पर थे वहीँ दूसरी तरफ मोदी सरकार उनके स्वागत में देश में विकास के नाम पर किसानो को बर्बाद करने का काला कानून बनाने के लिए अध्यादेश जारी करती है | युवा क्रांति के साथियों ने न केवल अमेरिका के सरगना का विरोध करने की ठानी बल्कि झूठे विकास के नाम पर किसानो को बर्बाद करने वाले अध्यादेश के खिलाफ लड़ने का ऐलान किया | 24 जनवरी को “अमेरिका का डॉलर राज और ओबामा की भारत यात्रा” नामक एक गोष्ठी  गाँधी शांति प्रतिष्ठान में निर्धारित हुई | इसकी तैयारियों के दौरान २२ जनवरी की रात को मैं और मेरे ३ साथी जंतर – मंतर पर “ओबामा –गो बैक” के पोस्टर लगाते हुए दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किये गए  | २ दिन तक पुलिस हिरासत में ख़ुफ़िया विभाग और पुलिस के आला अधिकारियों द्वारा पूछताछ चलती रही फिर टीम अन्ना के सदस्य डॉ. राकेश रफ़ीक और अक्षय कुमार के आने के बाद रिहा किया गया | लेकिन इस घटना के बावजूद 24 जनवरी का हमारा कार्यक्रम सफल रहा | इस कार्यक्रम में न केवल समाजसेविका मेधा पाठकर आकर हमारे साथ शामिल हुई बल्कि किसान नेता सरदार वी एम सिंह और चौधरी हरपाल सिंह सहित कई  किसान नेता भी शमिल हुए | युवा क्रांति के संयोजक रवि कोहाड़ ने अपनी प्रेजेंटेशन में बताया की किस तरह अमेरिका की नीतियों से आज हमारा किसान बर्बादी की ओर है | युवाओं ने भी अपने विचार रखे और इस अध्यादेश के हर पहलु पर चिंतन हुआ | यहीं से फैसला लिया गया की 30 जनवरी को भगतसिंह पार्क से गाँधी समाधि तक पदयात्रा निकली जाएगी | इस तरह भूमि – अधिग्रहण के खिलाफ दिल्ली में पहला विरोध प्रदर्शन हुआ | जिसमें  लगभग 500 लोग शामिल थे – डॉ. राकेश रफ़ीक, मेधा पाटकर, अरुणा रॉय, कविता कृष्णन, सरदार वी एम सिंह, चौधरी हरपाल सिंह, योगेंदर यादव और युवाओं का नेतृत्व करते हुए युवा क्रांति के संयोजक रवि कोहाड़ | पद यात्रा के बाद गाँधी समाधि पर ही चिंतन हुआ और तय किया गया की संसद शुरू होते ही 24 फ़रवरी को एक विशाल धरना प्रदर्शन संसद के सामने किया जाये | यहाँ से शुरू हुआ असली खेल जहाँ एक तरफ चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता डॉ. राकेश रफ़ीक के नेत्रत्व में हम किसान नेताओं से मिल रहे थे वहीँ सत्ता द्वारा हमारी शक्ति को नष्ट करने के षड़यंत्र रचे जा रहे थे |
सर्वप्रथम हम किसान यूनियन के नेता चौधरी हरपाल सिंह जी के साथ जाकर बीकेयू के नेता चौधरी राकेश टिकैत से मिले की किसानो की लड़ाई शुरू हो गई है, आप इसका नेतृत्व करें और 24 फ़रवरी को शामिल हो लेकिन उन्होंने कहा की आप अभी करिए हम मार्च महीने में करेंगे | हमने उनको सहमत करने की हरसंभव कोशिश की कि अगर संसद शुरू होते ही एक धरना प्रदर्शन हो तो सरकार दवाव में आ जाएगी लेकिन वो नहीं माने और ये तक कह दिया की अगर बीकेयू का कोई किसान 24 फरवरी को शामिल होगा, तो उसे बीकेयू से बाहर कर दिया जायेगा | उसके बाद में खुद देश में किसानो के सबसे बड़े अर्थशास्त्री कहे जाने वाले डॉ. देवेंदर शर्मा से मिला उन्होंने न केवल इस लड़ाई में पूरा साथ देने का वादा किया बल्कि हरियाणा, पंजाब के कई किसान नेताओं के संपर्क भी दिए | युवा क्रांति की शक्ति सीमित होने के कारण मुझे और हमारे सह- संयोजक साईं हिमांशु तिवारी को किसान आन्दोलन की लड़ाई लड़ने के लिए नियुक्त किया गया | हमने पंजाब के बलवीर सिंह राजेवाल, मंजीत धनेर, दर्शनपाल, हरजिंदर सिंह, दिल्ली/एनसीआर के रावत, सुनील फौजी, मनवीर भाटी, हरियाणा के महावीर गुलिया, गुरुनाम सिंह चंदुनी, सतवीर डागर, सत्यवान, यूपी के अखिलेंदर प्रताप सिंह, हरपाल सिंह, वीएम सिंह, महाराष्ट्र से प्रतिभा शिंदे, चूकी, ओडिशा के अक्षय कुमार, लिंगराज, मध्य प्रदेश के ईश्वरचंद त्रिपाठी, माधुरी बहन, सुनीलम, असाम के अखिल गोगोई, बिहार के अर्जुन सिंह सहित सैंकड़ों किसान संगठनो से मिले और सबको 24 फ़रवरी को एक साथ एक मंच पर ला दिया | जहाँ एक तरफ मेधा पाटकर जी, अरुणा रॉय, पी वी राजगोपाल, कविता कृष्णन शामिल हुए वहीँ वहीँ कुछ राजनैतिक पार्टियों के किसान फ्रंट को साथ जोड़ने से भी मजबूती मिली जैसे जय  किसान अभियान के योगेंदर यादव और अखिल भारतीय किसान संगठन के अतुल अनजान और हनान मोला | 
किसान नेताओं को एक मंच पर आने में उनके अहम् का टकराव आ रहा था इसलिए एक नेतृत्व की समस्या सामने आ गई | इस समस्या का समाधान हमारे मार्गदर्शक और अन्ना कोर कमेटी के सदस्य रहे जो इस आन्दोलन के केंद्र बिंदु भी हैं डॉ. राकेश रफ़ीक, जिन्होंने अन्ना जी को आह्वान किया की आप किसानो की इस लड़ाई को मजबूती देने के लिए 24 फ़रवरी को किसानो के मंच पर शामिल हो जाओ | उनको लगातार युवा क्रांति के कार्यालय से सम्पर्क करके समझाया गया की कैसे ये कानून न केवल किसानो को बर्बाद करने के लिए अपितु देश को बर्बाद करने के लिए है | जैसे ही उन्होंने अपने आने की सहमती मीडिया को दी उनको रोकने के लिए बहुत सारी ताकत लगा दी गई | एक तरफ पी. वी. राजगोपाल जी ने अन्ना जी को सहमत किया कि आप 19 फ़रवरी को जो 5000 मजदूर किसान पलवल से चलेंगे उनको हरी झंडी दिखाइए और वो 24 फ़रवरी को पैदल यात्रा करते हुए दिल्ली जंतर मंतर पर किसानो से जा मिलेंगे लेकिन अन्ना जी के यात्रा को हरी झंडी दिखने के बावजूद कुछ ताकतों ने इस काफिले को 24 फरवरी को संसद मार्ग पर किसानो के धरना प्रदर्शन में नहीं पहुँचने दिया | वहीँ अन्ना जी के चारों ओर एक जाल बिछाया गया और अन्ना के ही कुछ साथियों ने सत्ता के दबाव में 24 फ़रवरी के कार्यक्रम को विफल बनाने के लिए 23 फ़रवरी को जंतर – मंतर पर अन्ना जी के ही कुछ समर्थकों द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी बैनर तले विरोध प्रदर्शन रख दिया और अन्ना जी को कहा की यहीं सब किसान शामिल होंगे क्यूंकि वहीँ पर 23 फ़रवरी को कोंग्रेस का भी प्रदर्शन होना था और उनका अनुमान था की यही भीड़ अन्ना जी के वहां दिखाकर एक कार्यक्रम कर देंगे लेकिन कोंग्रेस ने अपना प्रदर्शन रद्द कर दिया और अन्ना समर्थकों का ये प्रदर्शन 23 फ़रवरी को कम भीड़ होने के कारण फीका ही रहा जो की एक शाजिस के तहत था | लेकिन अन्ना जी को समझ आ गया और वो 24 फ़रवरी को पूरा दिन संसद मार्ग पर किसानो के मंच पर रहे लेकिन फिर भी वो तथाकथित अन्ना समर्थक काफी किसानो को अन्ना जी के 23 फ़रवरी वाले मंच पर जोकि जंतर मंतर पर था बरगालाते रहे की जल्दी ही अन्ना जी यहाँ आयेंगे | हमारे इस मोर्चे के एक मजबूत किसान नेता सरदार वी एम सिंह ने भी कुछ दवाबों में जंतर – मंतर पर 24 फ़रवरी को अलग से मंच लगा दिया जबकि कई बार उनके घर जाकर हमने उनसे अपील कि थी ये किसानो की  लड़ाई एक साथ लड़नी है | इतने सब षडयंत्रों के बावजूद 24 फ़रवरी इस लड़ाई का एक अहम् बिंदु बना और 25 से 30 हज़ार किसानो की भीड़ उस दिन संसद मार्ग पर थी वहीँ मंच पर देश के तमाम किसान नेता मोजूद थे | जैसा की पहले से निर्धारित था किसी राजनैतिक पार्टी के नेता को मंच पर स्थान नहीं मिलेगा और अगर कोई नेता आता है तो वो ज़मीन पर किसानो के साथ बैठेगा तो जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल समर्थन देने आये तो युवा क्रांति के वोलेंटीयर्स ने उन्हें मंच पर नहीं चढने दिया | उनका मंच पर आने का जूनून इस कदर था की दो बार जब उन्हें सीढियों से मंच पर नहीं चढने दिया तो 7 फीट ऊँचे मंच पर नीचे से आम –आदमी पार्टी के विधायकों ने उन्हें उठाकर अमान्य तरीके से मंच पर चढ़ाया | इस पर युवा क्रांति के नौजवान बेकाबू हुए और उन्हें मंच से फेंकने की और चल दिए लेकिन मंच का संचालन कर रहे युवा क्रांति के मार्गदर्शक डॉ. राकेश रफ़ीक ने हमको रोका की इनका इस तरह मंच पर चढ़ना बिलकुल गलत है लेकिन अब एक राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें मंच पर रहने दो | लेकिन मीडिया ने इस घटना को बिलकुल अलग तरीके से दिखाया | इस प्रदर्शन ने मोदी सरकार के सीने में कील ठोंक दी और फिर सभी पार्टियाँ अपने राजनैतिक हितों की पूर्ती के लिए मैदान में आ गयी |
इस आन्दोलन को जमीनी स्तर पर ले जाने और मजबूती देने के लिए युवा क्रांति  ने अन्ना जी की 4 सभाएं दिल्ली के चारों ओर हरियाणा, पंजाब, यूपी और राजस्थान में 20 से 25 मार्च के बीच निर्धारित करवाई जिनको अन्ना जी ने खुद मिडिया के सामने ब्यान में भी कहा था | लेकिन कुछ NGO के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय ताकतों ने दबाव बनाकर वहीँ महाराष्ट्र से उनकी पदयात्रा का कार्यक्रम बना दिया और फिर बाद में उसे भी रद्द कर दिया ओर अन्ना जी को वहीँ महाराष्ट्र में बिठा दिया | युवा क्रांति के सह – सयोंजक साईं हिमांशु तिवारी ने रालेगन जाकर बहुत विनती अन्ना जी से करी  की वो ये सभाएं स्थगित न करें ये लड़ाई जो इतनी मजबूती से चल रही है वो धीमी पड़ जाएगी और इन साम्राज्यवादी ताकतों के आगे किसान हार जायेंगे लेकिन पता नहीं किस दबाव के चलते वो चुप ही रहे और महाराष्ट्र से निकलने के लिए मना कर दिया | फिर हम खुद युवा क्रांति के नौजवान नेता और देशभर के अन्य किसान नेता जो इस लड़ाई में हमारे साथ जुड़ गए इन निर्धारित तिथियों पर भिवानी ( हरियाणा ), खन्ना ( पंजाब ) और बिलारी (यूपी ) गए और किसानो और युवाओं को इस लड़ाई के लिए जागरूक किया और फिर अन्ना जी का वो स्थान सोनिया गाँधी ने विभिन्न स्थानों पर सभाएं करके अपने पक्ष में खड़ा कर लिया | मोदी सरकार द्वारा लाये गए इस अध्यादेश को उच्चतम न्यायलय में वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह के जरिये जनहित याचिका दायर करके चैलेन्ज किया जिसमें युवा क्रांति की तरफ से मैं और दिल्ली ग्रामीण समाज की तरफ से कर्नल बलहारा और भारतीय किसान यूनियन के नेता भी शामिल रहे |
युवा क्रांति ने सीमित संसाधन और शक्ति होते हुए भी लगातार देश – भर के किसान संगठनो से वार्तालाप करते हुए उन्हें एकजुट करने की अपील की है | जहाँ मोदी सरकार ने भूमि – अधिग्रहण बिल के लिए 30 सांसदों की एक कमेटी का गठन किया, वहीँ हमने 25 मई को दिल्ली में अभी तक इस लड़ाई में शामिल सभी किसान संगठनो को एकत्रित कर एक सभा का आयोजन किया और सर्वसम्मति से “किसान आंदोलनों का राष्ट्रीय ( NAFMNational Alliance of Farmers Movement ) का गठन किया | NAFM के संयोजक मंडल ने जहाँ इन सभी सांसदों के निवास पर जाकर उनको भूमि – अधिग्रहण बिल पर सुझाव पत्र सोंपा वहीँ 15 जून को संसद भवन में इस कमेटी के अध्यक्ष श्री अहलुवालिया सहित पूरी टीम के साथ एक बैठक की और विस्तृत रूप से अपना सुझाव पत्र सोंपा वहां मेने युवाओं को संबोधित करते हुए बोला की भारत सरकार ने पहला मौका आपको दिया है क्यूंकि आप शायद किसानो के बारे में सबसे ज्यादा जानते हैं और ऐसे में हम उम्मीद करते हैं कि आप देश हित और किसान हित में फैसला लेंगे लेकिन अगर आप इस मौके से चूक गए और किसानो के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश की तो फिर दूसरा मौका हम देश के नौजवानों के हाथ में है | और इस बात का खास ख्याल रखें की देश के नौजवानों ने 24 फ़रवरी को सिर्फ एक ट्रेलर आपको दिखाया अगर आप चूके तो फिर पूरी पिच्क्चर चलेगी |
दोस्तों  हमारे साथियों पर लगातार अंतराष्ट्रीय ताकतों द्वारा हमले हो रहे हैं, लेकिन किसी को भी अपनी जान की परवाह नहीं है और आपसे भी ये अपील करते हैं की इस आन्दोलन को मजबूत करें क्यूंकि पूरे देश को बेचने का और किसानी  को समाप्त करने का प्लान ये तैयार कर चुके हैं, अब आपकी ख़ामोशी इसको अमली जामा पहनाने का काम कर रही है | अपनी आवाज को बुलंद करें और इस देश को बर्बाद होने से बचाएं |

जय हिन्द जय किसान | 
लेखक - प्रताप चौधरी