Monday, 27 April 2015

लाचार किसान


अपने ही खेतों में आज अपनी ही कब्र बनाने
चले है किसान आज अपना ही कफ़न लाने
 की अब तो सुकूँ दो गज जमीं के निचे ही मिलेगा
की चले है जो अपने हाथो से अपना ही घर जलाने
की निकल के सोना खेत से जिसने चिड़िया थी बनाई
आज अपने उसी खेत में अपनी बेटी दफ़न कर आई
की दफ़न करते वक्त बेटी ने पूछा
( ये बापू बता ऐसी क्या नौवत आई )
की हूँ लाचार बेटी क्या बताऊ
की केसी मोदी लहर आई
की बता बापू ये कौन है और कितना  पाप करेगा
की हम जब अपने खेतों में मरेंगे तभी सुकूँ मिलेगा
बापू जरा सोच के बता कही ये सब का काल तो नहीं
की करके मुझे दफ़न, की बता बापू अब तू क्या करेगा
की मत पूछ बेटी अब और में कितना पाप करूँगा
इसी जगह पे आके तेरी माँ तेरे भाईओ को दफ़न करूँगा
एक सहारा थी जमी उस सहारे को छीन लिया
तू देखती जईओ  बेटी ऐसी जगह पे आके मरूंगा
तुझे तो पता है की हम दाने - दाने  को मोहताज हो गए
ऐसी लहर ये चली  हम पुरे बर्बाद हो गए
की अब ये लांचर क्या करे (आंसू पोछती हुई, मत रो बापू )
हम मिटटी के थे  औलाद, तो मिटटी में ही दफ़न हो गए
की मत रो बापू भगवान उसका विनास करेगा
जो हमारी इस जमी पर अपनी बिल्डिंग  खड़ी करेगा
की कभी उसका भला होगा नहीं ये बद्दुआ है मेरी
ये बापू तू बता की क्या हर किसान एसे ही  मरेगा
की चुप हो जा बेटी अब अलविदा तो लेले
मरने से पहले किसानो को कुछ तो दुआं दे दे
की क्या दुआ दू बापू संसार तो मेने देखा ही नहीं
बस एक दफा निकल के अपनी बाहों में भरले
की खेती चली गयी, बेटी चली गयी
जरा हाथ छोड़ बापू , तेरी छोटी चली गई
भाई भी मरे मेरे आँखो के सामने,
 की  बूढी थी माँ वो भी रोती चली गई
की देख के दुनिया लगता है बर्बादी की नौमत गई
क्या करू बापू मै जो मोदी की लहर छा गई
बस बापू मुझे दफन तू करदे  अब नहीं देखा जाएगा
की लाशो के ऊपर बिल्डिंग अब ऐसा भी वक्त आएगा


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