Friday, 10 April 2015

बैंको का मायाजाल

आज भारत की सवा सौ करोड़ जनता और पूरी दुनिया की 700 करोड़ आबादी जिस भयावक स्थिति से गुजर रही है | उस स्थिति को अनुभव करते हुए कोई भी जागृत व्यक्ति चुप नहीं बैठ सकता | आज विश्व गरीबी, बेरोजगारी, शोषण, आर्थिक विषमताओं से लेकर हिंसा, आतंकवाद और धार्मिक असहिष्णुता संवेदनशील समस्याओं से गुजरते हुए विनाश के कगार पर खड़ा है | आज भी पूरी दुनिया मे हर रोज करीबन 34 हजार बच्चे भूख और कुपोषण से मर रहे हैं | जबकि 700 करोड़ लोगों में से 100 करोड़ लोग रोज भूखे सो रहे हैं | अगर आगे हिंसा, युद्ध और आतंकवाद को लेकर विशलेषण किया जाये तो हर साल लाखों लोग अपनी जान गंवाते हैं | जबकि अगर केवल भारत की बात की जाए तो बेरोजगारी समस्या को लेकर प्रतिबर्ष 1 करोड़ 10 लाख की बेरोजगारी फौज तैयार हो रही है | शोषण और आर्थिक विषमता को लेकर अगर बात की जाए तो पूरी दुनिया के 7% लोगों का 85% संसाधनों पर कब्ज़ा है | और भारत में 100 पूंजीपतियों के पास देश का 52% संसाधन मौजूद है | जल, जंगल, जमीन और प्राकर्तिक संसाधन पर कोर्पोरारेट सेक्टर का कब्ज़ा दिनों दिन बढता जा रहा है | हर रोज किसान, आदिवासी, दलित को उसके मूलभूत अधिकार से वंचित कर जल, जंगल, जमीन छीना जा रहा है | धार्मिक और सामाजिक असहिष्णुता, नारी उत्पीडन, नैतिक अधोपतन अपनी सीमा का उल्लंघन कर चुका है | आज दुनिया की आर्थिक, राजनैतिक ओर सामाजिक समस्याओं को सामंतवादी, पूंजीवादी से लेकर साम्यवाद और समाजवाद तक का सारा ढांचा सुलझाने में असमर्थ रहा है |
इन सारी समस्याओं को लेकर अपने देश समेत पूरी दुनिया में जो उथल पुथल मची है, उस समस्याओं का समाधान करने के लिए अतीत से लेकर आज तक बहुत सारे लोगों ने बहुत सारे प्रयास किये है | मगर सारे प्रयास एक सीमा तक पहुँच कर समाप्त हो जाते हैं या समाप्त कर दिए जाते हैं | रूसो से लेकर टोलस्टाय, मार्क्स से लेकर गांधी तक जितनी भी विचारधाराओं का प्रयास चल रहा है, सारे प्रयास एक सीमा में बंध से गये हैं | आजादी के बाद में विनोबा, जयप्रकाश का और आज के समय में अन्ना जी द्वारा किये गए अभूतपूर्व प्रयास एक कदम जाने के बाद रास्ता खो गये, चलता हुआ एतिहासिक आन्दोलन भी अपनी मंजिल ढूढ रहा है | सवाल इस बात का है कि इन सारे ईमानदार प्रयासों में कमी कहाँ रह जाती है | क्या व्यवस्थाओं का विशलेषण करने में, रणनीति में, व्यक्तित्व में या तीनो में |

                  इस पुस्तिका में रणनीति और व्यक्तित्व को पीछे रखते हुए व्यवस्था के विशलेषण में रह गयी कमी को दूर करने के लिए कुछ प्रयास करने की कोशिश की गयी है | दिखाई देने वाला शरीर के ऊपरी हिस्से का फोड़ा रोग का लक्षण हो सकता है, मगर रोग का कारण नही | ऐसे ही देश और दुनिया में बढ रही गरीबी, भुकमरी, बेरोजगारी, अत्याचार इत्यादि समाज के रोग का लक्षण हैं मगर कारण नहीं | असली कारण तो विनिमय अर्थशास्त्र के आधार पर खड़ी हुई वितीय पूँजी का संस्थान है | विनिमय अर्थशास्त्र का दार्शनिक आधार है जो व्यक्ति, समाज ओर प्रकृति के बीच के सतत संतुलित संबंध को विखंडित कर देता है | उसी के आधार पर वितीय पूँजी का संस्थान खड़ा है | ओर इस वित्तीय पूँजी की ईमारत इतनी जटिल ओर मजबूत है, जिसको समझाने के लिए बड़े बड़े अर्थशास्त्री का दिमाग भी चकरा जाता है ओर बड़े बड़े क्रांतिकारियों का सामर्थ्य भी बोना साबित हो जाता है | इस वित्तीय पूँजी के खेल को समझकर जो गिने चुने राष्ट्रनेताओं ने थोडा बहुत कदम उठाने का साहस किया उनको ख़त्म करके उनके प्रयास को समाप्त कर दिया गया | अवश्य इस पुस्तिका में व्यवस्था का विश्लेषण देने के बावजूद व्यक्तित्व व रणनीति के सवाल पर छोटी सी झलक देते हुए व्यापक विश्लेषण को अभी के लिए दूर रखा गया है, मगर इस पुस्तिका में वित्तीय पूँजी के विश्लेषण के साथ तकनीकी कार्यान्वन की सारी जटिल प्रक्रिया का खुलासा किया गया है, जो इस पुस्तिका का असली सार है | ये पुस्तिका जल्द ही आप सबके बीच होगी ....................

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